शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

प्रथम प्रयास की चिंगारी — साधारण जीवन को असाधारण बनाने की राह— संत लहरी सिंह जी की प्रेरणादायी उक्ति पर आधारित

प्रथम प्रयास की चिंगारी — साधारण जीवन को असाधारण बनाने की राह

— संत लहरी सिंह जी की प्रेरणादायी उक्ति पर आधारित 

कई बार हम अपने जीवन को देखकर सोचते हैं — “क्या मैं कुछ बड़ा कर सकता हूँ? क्या मैं इस सीमित जीवन को कुछ अर्थ दे सकता हूँ?” और अक्सर, इसी सवाल में उलझे रह जाते हैं। परंतु संत लहरी सिंह जी का यह वाक्य उस उलझन को तोड़ देता है —“शुरुआत ही वह चिंगारी है जो साधारण जीवन को असाधारण बना देती है।” यह वाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह बताता है कि परिवर्तन की सबसे बड़ी कुंजी है — पहला कदम उठाना।

शुरुआत: परिवर्तन का पहला संकेत

हर महान कार्य, हर ऐतिहासिक बदलाव और हर उपलब्धि एक छोटी सी शुरुआत से ही शुरू होती है। बीज जब मिट्टी में डाला जाता है, तो वह अंधकार में होता है। कोई नहीं जानता कि वह कभी वृक्ष बनेगा या नहीं। लेकिन वह बीज हार नहीं मानता, वह जड़ों को फैलाता है, मिट्टी को चीरता है, और अंततः एक विशाल पेड़ बन जाता है। जीवन की हर शुरुआत भी ऐसी ही होती है — छोटी, अनिश्चित, पर संभावनाओं से भरी हुई। संत लहरी सिंह जी कहते हैं कि जब तक व्यक्ति पहला कदम नहीं उठाता, तब तक जीवन केवल प्रतीक्षा बनकर रह जाता है। शुरुआत ही वह क्षण है, जब हम अपने सपनों को वास्तविकता में बदलने की दिशा में पहला प्रयास करते हैं।

डर और संदेह — शुरुआत के सबसे बड़े शत्रु

शुरुआत करना आसान नहीं होता। मन में डर होता है — “अगर असफल हुआ तो?”परंतु सच्चाई यह है कि जो कोशिश नहीं करते, वे पहले ही हार चुके होते हैं।
जो पहला कदम उठाता है, वही विजेता बनने की राह पर होता है।संत लहरी सिंह जी के शब्दों में —“जो चल पड़ा, वही पहुँचने की संभावना रखता है। जो रुका, उसने संभावनाओं के द्वार स्वयं बंद कर लिए।”हम अक्सर दूसरों की सफलता देखकर प्रेरित होते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि उनकी यात्रा भी एक छोटे से कदम से ही शुरू हुई थी। चाहे वह महात्मा गांधी हों, डॉ. भीमराव अंबेडकर हों या स्वामी विवेकानंद — सभी ने अपनी जीवन-यात्रा किसी छोटी शुरुआत से की थी, जिसने बाद में इतिहास बदल दिया।

 चिंगारी से अग्नि बनने तक की यात्रा

संत लहरी सिंह जी की यह उक्ति “शुरुआत ही वह चिंगारी है...” गहराई से समझने पर यह सिखाती है कि शुरुआत करना ही पर्याप्त नहीं — उसे निरंतरता और दृढ़ता से सींचना भी आवश्यक है। एक बार जो चिंगारी जल उठती है, उसे लौ में बदलने के लिए हवा चाहिए — यानी निरंतर प्रयास।  जब व्यक्ति अपने उद्देश्य पर केंद्रित रहता है, तो वही चिंगारी धीरे-धीरे अपने जीवन को प्रकाशमान बना देती है। यही वह क्षण होता है, जब साधारण जीवन असाधारण बन जाता है।

शुरुआत आत्मविश्वास से जन्म लेती है

शुरुआत के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है — विश्वास। स्वयं पर, अपनी क्षमता पर, और अपने उद्देश्य पर विश्वास।  जब व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ पहला कदम उठाता है, तो ब्रह्मांड उसके पक्ष में काम करने लगता है। संत लहरी सिंह जी मानते थे कि “जब मनुष्य अपने भीतर के ईश्वर पर भरोसा करता है, तब हर असंभव कार्य संभव हो जाता है।”  इसलिए, हर शुरुआत आत्मविश्वास का उत्सव है — यह बताती है कि “मैं कर सकता हूँ”।

 हर शुरुआत एक संकल्प है

आध्यात्मिक दृष्टि से, शुरुआत केवल कर्म नहीं — संकल्प है। यह आत्मा की इच्छा का प्रकट रूप है। जब हम सच्चे मन से किसी कार्य के लिए समर्पित होते हैं, तो हमारे भीतर की चेतना उस दिशा में ऊर्जा उत्पन्न करती है। संत लहरी सिंह जी कहा करते थे —“यदि तुम्हारा उद्देश्य शुद्ध है, तो प्रकृति स्वयं तुम्हारी सहायता करेगी।” इसलिए, शुरुआत का अर्थ है अपनी चेतना को जागृत करना — अपने भीतर छिपी सामर्थ्य को सक्रिय करना।

समाज में बदलाव की शुरुआत

यह विचार केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है। समाज में भी परिवर्तन तब ही आता है जब कोई व्यक्ति शुरुआत करता है।  कभी-कभी वह शुरुआत एक सवाल से होती है — “क्यों?” कभी वह विरोध से होती है — “अब और नहीं।”  और कभी वह सेवा से होती है — “मैं कुछ करूँगा।” हर सामाजिक क्रांति, हर सुधार, हर आंदोलन — किसी एक व्यक्ति की शुरुआत से ही जन्मा है।  इसलिए यदि आप समाज में कुछ बदलना चाहते हैं, तो इंतज़ार मत कीजिए — स्वयं शुरुआत कीजिए।

 संत लहरी सिंह जी का सन्देश — अपने भीतर की चिंगारी पहचानो

संत लहरी सिंह जी का पूरा जीवन इस विचार का साक्षात उदाहरण था। उन्होंने साधारण जीवन से शुरुआत की, पर अपने आत्मबल, साधना और समाजसेवा से असाधारण ऊँचाइयों को प्राप्त किया। उनकी हर शिक्षा यही कहती है कि कोई भी व्यक्ति छोटा नहीं होता — छोटा होता है उसका साहस न करना। उनके अनुसार, “शुरुआत करने वाला ही सृजनकर्ता है, क्योंकि वही नई दिशा दिखाता है।”

निष्कर्ष — पहला कदम ही चमत्कार है

जीवन में हम सभी किसी न किसी लक्ष्य की तलाश में हैं — सफलता, शांति या आत्मबोध की।  लेकिन जो फर्क पैदा करता है, वह केवल एक चीज़ है — शुरुआत करने की हिम्मत। शुरुआत करने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन की कहानी का लेखक बनता है।  वह चिंगारी जो शुरुआत में छोटी लगती है, वही आगे चलकर अपने प्रकाश से दुनिया को रोशन करती है।इसलिए आज, अभी, इसी क्षण — उस चिंगारी को जलाइए। उस कदम को बढ़ाइए। क्योंकि जैसा संत लहरी सिंह जी ने कहा —🌟 “शुरुआत ही वह चिंगारी है

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

हर गलती एक अनुभव है, और हर अनुभव एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है— संत लहरी सिंह कश्यप के जीवन दर्शन पर आधारित प्रेरक व्याख्या

हर गलती एक अनुभव है, और हर अनुभव एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है


— संत लहरी सिंह कश्यप के जीवन दर्शन पर आधारित प्रेरक व्याख्या

जीवन एक निरंतर यात्रा है, जिसमें हर कदम पर हम कुछ न कुछ सीखते हैं। इस यात्रा में कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल; कभी मुस्कराते हैं, तो कभी गिरकर संभलते हैं। लेकिन संत लहरी सिंह कश्यप का यह कथन हमें जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई का बोध कराता है — “हर गलती एक अनुभव है, और हर अनुभव एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है।”यह वाक्य मात्र प्रेरणादायक नहीं, बल्कि आत्म-विकास और आध्यात्मिक उत्थान का सूत्र है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में की गई हर गलती, हर ठोकर, हर असफलता वास्तव में हमें बेहतर बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

🌺 गलती: जीवन की अनिवार्य सच्चाई

संत लहरी सिंह कश्यप का मानना था कि गलती करना मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। जो काम करता है, वही गलती करता है।  लेकिन गलती करना समस्या नहीं है — असली समस्या तब शुरू होती है जब हम गलती को स्वीकार करने से डरते हैं। कश्यप जी कहते थे —“जो गलती से डरता है, वह सीखने से भी डरता है। और जो सीखने से डरता है, वह बढ़ने से रह जाता है।”यह बात गहराई से सोचने योग्य है। क्योंकि जब तक हम असफलता या गलती को शत्रु मानते रहेंगे, हम अनुभव को गुरु के रूप में नहीं पहचान पाएँगे।गलती जीवन का दंड नहीं, बल्कि सुधार का अवसर है।

🔥 गलती से नहीं, उससे न सीखने से होती है हार

कई बार हम किसी कार्य में असफल होते हैं और सोचते हैं कि हमने हार मान ली। लेकिन यदि हम उस असफलता से कुछ सीख लेते हैं, तो वह हार नहीं, सफलता की पहली सीढ़ी बन जाती है।  संत लहरी सिंह कश्यप का यह संदेश हमें सिखाता है कि हर असफलता के पीछे सफलता का बीज छिपा होता है।उदाहरण के लिए —एक बच्चा जब चलना सीखता है, तो वह गिरता है, रोता है, फिर उठकर दोबारा प्रयास करता है। यदि वह पहली बार गिरने पर रुक जाए, तो क्या वह चलना सीख पाएगा? नहीं। वह तब ही चलता है जब वह अपनी गलती को अनुभव में बदल देता है। इसी प्रकार जीवन में भी हर गिरावट हमें ऊपर उठने का अवसर देती है।जो लोग अपनी गलती को स्वीकार करते हैं और सुधारते हैं, वही आगे बढ़ते हैं।

🌞 अनुभव ही सच्चा गुरु है

पुस्तकें, गुरु और शिक्षा मार्गदर्शन दे सकते हैं, लेकिन वास्तविक ज्ञान अनुभव से ही आता है।  संत लहरी सिंह कश्यप कहते थे —“पुस्तक ज्ञान बुद्धि को तीक्ष्ण करता है, पर अनुभव आत्मा को परिपक्व करता है।”जब कोई व्यक्ति गलती करता है, तो उसे अपनी कमज़ोरियों का बोध होता है। यह बोध ही अनुभव है।अनुभव हमें बताता है कि हमें अगली बार क्या करना चाहिए और क्या नहीं।हमारे पूर्वजों ने भी यही कहा —“संसार ही सबसे बड़ा विद्यालय है, और अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक।” जब हम अपनी भूलों से सीखते हैं, तब हम अपने जीवन के प्रति सजग होते हैं। यह सजगता हमें धीरे-धीरे आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।

🌻 हर अनुभव एक सीढ़ी है – ऊँचाई की ओर बढ़ने का मार्ग

संत लहरी सिंह कश्यप का यह कथन केवल आत्म-सुधार नहीं, बल्कि आत्म-उत्थान की बात करता है।हर अनुभव हमें नीचे नहीं गिराता, बल्कि ऊपर उठाता है — यदि हम उसे समझें और आत्मसात करें।नहर दर्द हमें सहनशीलता सिखाता है,  हर असफलता हमें दृढ़ता सिखाती है,  हर ठोकर हमें दिशा देती है, और हर अनुभव हमें एक सीढ़ी ऊपर चढ़ाता है। जैसे एक मूर्तिकार जब पत्थर को काटता है, तो हर चोट उस पत्थर को आकार देती है। उसी प्रकार जीवन के अनुभव हमारी आत्मा को तराशते हैं।जो व्यक्ति इन अनुभवों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार करता है, वही सच्चा साधक बनता है।

🕊️ गलती से महानता तक – इतिहास के साक्ष्य

दुनिया के सभी महान व्यक्तियों का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि गलतियाँ और असफलताएँ सफलता की जड़ हैं।

  • थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने के पहले 1000 असफल प्रयास किए।
    जब उनसे पूछा गया कि क्या वह असफल हुए, तो उन्होंने कहा —


    “मैंने असफलता नहीं पाई, मैंने सिर्फ 1000 तरीके सीखे जो काम नहीं करते।”


  • अब्राहम लिंकन ने अनेक चुनाव हारे, व्यापार में असफल हुए, लेकिन अंततः अमेरिका के राष्ट्रपति बने।

  • गौतम बुद्ध ने भी वर्षों तक तप और साधना की, अनेक बार भ्रमित हुए, पर अनुभव से ही उन्हें मध्यम मार्ग का बोध हुआ।

इन सबका जीवन यही बताता है कि गलती अंत नहीं, बल्कि आरंभ है। हर अनुभव हमारी आत्मा की उन्नति का द्वार खोलता है।

🌼 संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण: आत्म-बल की पहचान

संत लहरी सिंह कश्यप के अनुसार, “मनुष्य के भीतर लौकिक और अलौकिक सभी शिखर छूने की सामर्थ्य है, पर अज्ञानता और भय उसे कमजोर बनाते हैं।” जब हम गलती को स्वीकारते हैं और उससे सीखते हैं, तो हम अज्ञानता की परतें हटाते हैं।  यह आत्म-ज्ञान हमें आत्म-बल प्रदान करता है।  संत लहरी सिंह कश्यप का दर्शन यही है — “गलती आत्मा को गिराती नहीं, बल्कि उसे जगाती है।”उनके प्रवचनों में यह बात स्पष्ट मिलती है कि मनुष्य अपने अनुभवों से ही परमात्मा के समीप पहुँचता है। जो अनुभवों को नकारता है, वह विकास की सीढ़ी काट देता है।  पर जो हर गलती को आत्मचिंतन का अवसर बनाता है, वह धीरे-धीरे ऊँचाइयों को छूने लगता है।

🌹आधुनिक जीवन में इस विचार का महत्व

आज की प्रतिस्पर्धा भरी दुनिया में लोग असफलता से इतना डरते हैं कि प्रयास करना ही छोड़ देते हैं।  बच्चों को भी अक्सर सिखाया जाता है कि “गलती मत करना।” पर वास्तव में हमें यह सिखाना चाहिए कि — “गलती करो, लेकिन उससे सीखो।”हर विद्यार्थी, शिक्षक, किसान, व्यापारी या साधक यदि यह समझ ले कि गलती अनुभव का आरंभ है, तो उसका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाएगा। तब वह हर कठिनाई में भी अवसर खोजेगा, हर असफलता में भी सबक पाएगा।

🌾 गलती से आत्म-विकास तक की यात्रा

  1. पहचानें — गलती हुई है, इसे नकारें नहीं।

  2. स्वीकारें — यह समझें कि यह अनुभव का आरंभ है।

  3. विश्लेषण करें — गलती क्यों हुई, कहाँ कमी रही।

  4. सुधारें — अगले प्रयास में बेहतर करें।

  5. आगे बढ़ें — अनुभव को अपनी ताकत बनाकर फिर से प्रयास करें।

यही जीवन की सीढ़ी है — हर कदम पर एक नया सबक, हर सबक से एक नई ऊँचाई।

🌼 निष्कर्ष: गलती ही महानता की जननी है

संत लहरी सिंह कश्यप का यह विचार एक दीपक की तरह है, जो अंधकार में मार्ग दिखाता है। “हर गलती एक अनुभव है, और हर अनुभव एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है।”  यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। यदि हम इस विचार को अपनाएँ, तो असफलता कभी हमें निराश नहीं करेगी, बल्कि सशक्त बनाएगी।  हर गिरावट हमें उठना सिखाएगी,  हर आलोचना हमें सुधारना सिखाएगी, और हर अनुभव हमें ऊपर — और ऊपर — उठाता चला जाएगा।

🌺 संक्षेप में: “गलती अंत नहीं, शुरुआत है। अनुभव बाधा नहीं, पुल है। और हर पुल हमें ऊँचाइयों की ओर ले जाता है।”— यही संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन दर्शन है, जो हर साधक को यह सिखाता है कि गलती से भागो मत, उसे अपनाओ, क्योंकि वही तुम्हारे उत्थान की पहली सीढ़ी है। 🌿

आत्मशक्ति : भीतर छिपी अनंत ज्योति की पहचान(संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों पर आधारित)

🌺 आत्मशक्ति : भीतर छिपी अनंत ज्योति की पहचान(संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों पर आधारित)

मनुष्य का जीवन केवल मांस और हड्डियों का शरीर नहीं है — यह चेतना का मंदिर है, जिसमें अनंत ऊर्जा, अनंत सामर्थ्य और अनंत संभावनाएँ निहित हैं। संत लहरी सिंह कश्यप कहते हैं —“हमारे भीतर लौकिक और अलौकिक सभी शिखर छूने की सामर्थ्य है, किंतु अज्ञानतावश हम कामनाओं की डाल पर बैठकर भूल गए कि हम उड़ान भरने में सक्षम हैं।” मनुष्य के भीतर ऐसी शक्ति है जो पर्वतों को हिला सकती है, परंतु वह स्वयं को तिनके-सा समझकर जीता है। यही आत्मविस्मृति सबसे बड़ा पतन है।

1. आत्मा का सूर्य और अज्ञान के बादल

हम सबके भीतर एक सूर्य है — आत्मा का सूर्य। यह सदैव प्रकाशमान है, परंतु अज्ञान, मोह और अहंकार के बादलों ने इसे ढक रखा है। जब तक ये बादल हैं, तब तक जीवन में अंधेरा रहेगा — भय रहेगा, असफलता रहेगी, निर्भरता रहेगी। संत जी कहते हैं कि अज्ञान ही वह परदा है जिसने हमें अपनी असली पहचान से दूर कर दिया है।हम सोचते हैं कि हम दुर्बल हैं, हम असहाय हैं, जबकि सच्चाई यह है कि —हम स्वयं शक्ति के स्रोत हैं।

2. कामनाओं की डाल पर झूलता मनुष्य

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसने अपनी चेतना को इच्छाओं की डाल पर टांग दिया है। वह हर क्षण किसी न किसी इच्छा में झूलता रहता है — कभी धन की, कभी प्रतिष्ठा की, कभी सुख की। इन इच्छाओं का कोई अंत नहीं। संत लहरी सिंह कश्यप कहते हैं —“अतृप्त कामनाओं में झूलते-झूलते याद ही नहीं रहा कि हमारे पास ध्यानरूपी पंख हैं।” ये वासनाएँ मनुष्य को जकड़ लेती हैं, जैसे मकड़ी अपने ही जाल में उलझ जाती है। मनुष्य भी अपने ही मन के जाल में फँसा हुआ है, जबकि मुक्ति का द्वार उसी के भीतर है।

3. चंदन की घिसाई : साधना का प्रतीक

संत जी एक अद्भुत उदाहरण देते हैं —चंदन जल में पड़ा रहे तो उसकी सुगंध खो जाती है, परंतु जब उसे घिसा जाता है, तो उसकी मूल खुशबू प्रकट हो जाती है। यह घिसाई ही साधना है। जब मनुष्य अपने जीवन को तपस्या, ध्यान और संयम की शिला पर घिसता है, तब उसके भीतर छिपी दिव्यता प्रकट होती है। हर दुख, हर संघर्ष, हर असफलता – यह सब हमारे “चंदनत्व” को उभारने वाली घिसाई है। जब हम इस सत्य को समझ लेते हैं, तब हम जीवन के हर अनुभव को अवसर मानने लगते हैं।

4. निर्मल आत्मा, दूषित मन

आत्मा स्वभाव से निर्मल है, पर मन उसे दूषित कर देता है। मन जब शरीर और विषयों से तादात्म्य स्थापित करता है, तब आत्मा की शुद्धता धूमिल हो जाती है। यही कारण है कि आज मनुष्य में प्रेम, दया और करुणा की जगह स्वार्थ और स्पर्धा ने ले ली है। संत जी कहते हैं —“निर्मल तत्व होते हुए भी शरीर के साथ तादात्म्य रखने के कारण हमारा व्यक्तित्व विषय-कषाय की दुर्गंध से दूषित हो रहा है।”यह दुर्गंध वही है जो लोभ, क्रोध और अहंकार से उठती है। जब तक यह मन में है, तब तक आत्मशक्ति का फूल नहीं खिल सकता।

5. ध्यान : आत्मा की ओर यात्रा

संत लहरी सिंह कश्यप ध्यान को आत्मशक्ति का द्वार मानते हैं।ध्यान कोई कर्म नहीं — यह जीवन का अनुभव है। जब हम ध्यान करते हैं, तो मन का शोर थमने लगता है, भीतर की नीरवता में आत्मा की आवाज़ सुनाई देती है। संत जी कहते हैं —“सतत साधना से अज्ञानजनित विकारों के बादल छंट जाते हैं और सतस्वरूप के सूर्य का प्रकाश फैल जाता है।”इस प्रकाश में व्यक्ति को अपने प्रश्नों के उत्तर, अपने अस्तित्व का अर्थ और अपनी शक्ति का बोध होने लगता है। यह वही क्षण होता है जब आत्मा कहती है — “मैं ही शक्ति हूँ, मैं ही प्रकाश हूँ।”

6. निश्चयबल : आत्मबल की कुंजी

संत लहरी सिंह कश्यप कहते हैं कि आत्मशक्ति का प्रथम सोपान है — निश्चयबल। जब तक व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, तब तक कोई भी शक्ति उसका साथ नहीं दे सकती। “अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो हमें ऊपर उठा सके।” निश्चयबल ही वह ज्वाला है जो असंभव को संभव बनाती है। जिस क्षण मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि मैं कर सकता हूँ, उसी क्षण उसकी सुप्त आत्मशक्ति जाग उठती है।

7. आत्मशक्ति और प्रेम का संबंध

संत जी आत्मशक्ति को केवल बल नहीं, बल्कि ममता और करुणा से युक्त शक्ति मानते हैं। वे कहते हैं — शक्ति जब प्रेम से जुड़ती है, तब वह सृजन बनती है; और जब अहंकार से जुड़ती है, तब विनाश। आज के युग में हम भौतिक रूप से सशक्त हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से खोखले। इसका कारण है — आत्मा से दूरी। आत्मशक्ति का जागरण केवल हमें बलवान नहीं बनाता, बल्कि हमें मानव बनाता है। जहाँ आत्मबल है, वहाँ क्षमा है। जहाँ आत्मबल है, वहाँ करुणा है।  जहाँ आत्मबल है, वहाँ हिंसा और द्वेष का स्थान नहीं।

8. आत्मशक्ति : समाज परिवर्तन की जड़

आत्मशक्ति केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक ऊर्जा भी है। जिस समाज के लोगों में आत्मबल होता है, वह समाज गुलाम नहीं रह सकता।  संत जी कहते हैं कि जिस क्षण व्यक्ति अपनी आत्मा को पहचान लेता है, उसी क्षण वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी जाति, पंथ या संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बंधता। उसका जीवन संदेश बन जाता है। उसकी वाणी दूसरों के हृदय को जगाती है, उसका आचरण दूसरों में साहस भरता है।

9.आज की दुनिया में आत्मशक्ति की आवश्यकता

आज का युग बाहरी प्रगति का युग है, पर भीतर अंधकार बढ़ रहा है। सुविधाएँ बढ़ीं, पर शांति खो गई।
तकनीक आई, पर मनुष्य का मन मशीन बन गया।
ऐसे समय में संत लहरी सिंह कश्यप का यह संदेश दीपक की तरह है —“हमें अपनी मूल स्थिति में लौटना है, ध्यान और साधना द्वारा प्रज्ञान से स्वयं को परिष्कृत करना होगा।” जब व्यक्ति स्वयं के भीतर लौटेगा, तब संसार में भी प्रकाश फैलेगा।

10.आत्मसाक्षात्कार : आत्मशक्ति का चरम रूप

आत्मशक्ति की यात्रा अंततः आत्मसाक्षात्कार पर समाप्त होती है। यह वह स्थिति है जब मनुष्य को यह अनुभव होता है कि — “मैं यह शरीर नहीं, मैं वह चेतना हूँ जो समस्त जगत में व्यापी है।” तब व्यक्ति संसार में रहकर भी संसार से परे हो जाता है।  वह कर्म करता है, पर कर्म का दास नहीं होता।  वह प्रेम करता है, पर आसक्ति से मुक्त रहता है।  वह सेवा करता है, पर अहंकार से परे रहता है। संत जी कहते हैं — “आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होते ही त्रिलोक में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो हमें मलिन कर सके। यह स्थिति ही सच्ची मुक्ति है, सच्ची दिव्यता है।

11.आत्मशक्ति जागरण के व्यावहारिक उपाय

संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों को व्यवहार में उतारने के लिए कुछ सरल मार्ग –

  1. प्रातः ध्यान का अभ्यास करें – सुबह का समय आत्म-संपर्क के लिए सर्वोत्तम है।

  2. दैनिक आत्ममंथन करें – हर रात स्वयं से पूछें कि आज मैंने कितना प्रेम, कितनी दया, कितनी करुणा दिखाई?

  3. स्वयं को दीन न समझें – हर परिस्थिति में “मैं कर सकता हूँ” का भाव रखें।

  4. सत्य और संयम का पालन करें – ये आत्मा की दो आँखें हैं।

  5. सत्संग और अध्ययन करें – महान विचारों के संपर्क में रहना आत्मशक्ति को पोषण देता है।

12. निष्कर्ष : आत्मशक्ति ही जीवन का सार

संत लहरी सिंह कश्यप का संदेश सीधा है — मनुष्य को बाहर कुछ पाने नहीं जाना चाहिए, उसे अपने भीतर झाँकना चाहिए। जो शक्ति तुम बाहर ढूँढ रहे हो, वह तुम्हारे भीतर सोई हुई है। बस साधना, श्रद्धा और निश्चय से उसे जगाओ। जब आत्मशक्ति जागती है, तब असंभव भी संभव हो जाता है।  तब मनुष्य न केवल अपने जीवन को, बल्कि समाज और संसार को भी नई दिशा दे सकता है।

🌼 अंतिम संदेश : संत जी की वाणी में

“अपने भीतर निश्चयबल जगाओ,  ध्यानरूपी पंख फैलाओ, क्योंकि आत्मा की ज्योति किसी मंदिर में नहीं, तुम्हारे अपने हृदय में जल रही है।  जब यह ज्योति प्रकट होगी,  तब अंधकार अपने आप मिट जाएगा।

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

संघर्ष, कर्म और शुरुआत की शक्ति : संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों में जीवन दर्शनभूमिका

संघर्ष, कर्म और शुरुआत की शक्ति : संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों में जीवन दर्शन


भूमिका

जीवन एक सतत यात्रा है — एक ऐसी यात्रा जो संघर्ष, कर्म, असफलता, सफलता और अनुभवों के अनेक रंगों से भरी होती है। संत लहरी सिंह कश्यप जी कहते थे — “जीवन निरंतर संघर्ष की एक गाथा है और संघर्ष की राह कभी सुगम नहीं होती।” यह कथन केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन का सार है। जिस प्रकार नदी अपने मार्ग में आने वाले पत्थरों को पार कर सागर तक पहुंचती है, उसी प्रकार मनुष्य भी संघर्षों को पार कर जीवन के लक्ष्य तक पहुंचता है। लेकिन इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है — कर्म। बिना कर्म के जीवन का अस्तित्व अधूरा है, क्योंकि कर्म ही वह माध्यम है जिससे मनुष्य अपने स्वप्नों को साकार करता है।

संघर्ष का अर्थ और उसका महत्व

संघर्ष का अर्थ केवल विपरीत परिस्थितियों से लड़ना नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं, भय और आलस्य से भी युद्ध करना है। संत लहरी सिंह जी कहते हैं कि “संघर्ष ही वह ताप है जिसमें जीवन की ईंटें तपकर मजबूत होती हैं।” जैसे कच्ची ईंट आग में तपकर मजबूत होती है, वैसे ही मनुष्य भी संघर्षों से गुजरकर दृढ़, परिपक्व और सफल बनता है। संघर्ष का मूल उद्देश्य हमें तोड़ना नहीं, बल्कि हमें तराशना होता है। वह हमें यह सिखाता है कि हर कठिनाई के भीतर एक अवसर छिपा है। जब जीवन सहज होता है, तब हम स्थिर हो जाते हैं, लेकिन जब जीवन कठिन होता है, तब हम विकसित होते हैं।
इसलिए संघर्ष जीवन का अभिशाप नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा वरदान है।

कर्म : जीवन का मूल आधार

कश्यप जी के विचारों में कर्म का स्थान सर्वोपरि है। वे कहते थे कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके कर्म से होती है, न कि उसके वंश, जाति या पद से।
कर्म का अर्थ केवल बाहरी कार्य नहीं, बल्कि वह आंतरिक प्रवृत्ति है जो हमें निरंतर क्रियाशील बनाए रखती है। अक्सर लोग सोचते हैं कि जब वे पूर्णतः सक्षम होंगे, तब कोई बड़ा कार्य शुरू करेंगे। लेकिन कश्यप जी स्पष्ट करते हैं कि — “सक्षमता आरंभ की शर्त नहीं, बल्कि परिणाम है।” अर्थात् जब हम कार्य प्रारंभ करते हैं, तब धीरे-धीरे सक्षमता विकसित होती है। यदि कोई व्यक्ति केवल अपनी ‘पूर्ण तैयारी’ की प्रतीक्षा करता रहेगा, तो शायद वह कभी आरंभ ही नहीं कर पाएगा।

शुरुआत की शक्ति : पहला कदम ही चमत्कार है

संत लहरी सिंह कश्यप जी के अनुसार, शुरुआत ही वह बिंदु है जहाँ से महानता की यात्रा प्रारंभ होती है। कोई भी महान व्यक्ति शुरुआत में महान नहीं था। हर सफलता की कहानी के पीछे एक छोटा, अनिश्चित, परंतु साहसी कदम होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है —

  • एक लेखक जिसने केवल एक पन्ना लिखा, वही आगे चलकर साहित्य का अमर नायक बन गया।

  • एक खिलाड़ी जिसने केवल अभ्यास की शुरुआत की, वही मैदान का विजेता बना।

  • एक समाज सुधारक जिसने अकेले आवाज उठाई, वही एक दिन आंदोलन का प्रतीक बन गया।

इसलिए पहला कदम सबसे महत्वपूर्ण होता है।
संत जी कहा करते थे — “यदि तुम एक कदम बढ़ाने का साहस कर लो, तो ईश्वर तुम्हारे आगे दस कदम बढ़ाता है।” अर्थात् प्रकृति भी उसी का साथ देती है जो आरंभ करता है।

पूर्णता की भ्रांति और प्रयास का सत्य

हममें से अधिकांश लोग यह मानते हैं कि कोई भी कार्य तभी किया जाए जब हम पूरी तरह तैयार हों — लेकिन यह विचार ही हमारी सबसे बड़ी रुकावट है। पूर्णता कोई आरंभिक अवस्था नहीं होती, बल्कि निरंतर अभ्यास, अनुभव और समय के साथ अर्जित की जाने वाली अवस्था है। यदि रवींद्रनाथ टैगोर ने तब तक लेखन टाल दिया होता जब तक उन्हें ‘पूर्ण कवि’ न लगने लगता, तो शायद हमें गीतांजलि जैसी कृति कभी न मिलती। यदि महात्मा गांधी ने तब तक आंदोलन शुरू न किया होता जब तक वे ‘राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व’ न होते, तो भारत की स्वतंत्रता का मार्ग बहुत लंबा होता। संत लहरी सिंह जी का कहना था — “कर्म में उतर जाओ, क्योंकि कर्म ही वह गुरु है जो तुम्हें सिखाता है।” हर गलती एक अनुभव है, और हर अनुभव एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है।

असफलता : सफलता की जननी

संत जी असफलता को जीवन का अभिशाप नहीं मानते थे। उनके अनुसार असफलता ही हमें मजबूत बनाती है।
वे कहते थे —  “जो गिरता नहीं, वह उठना नहीं सीखता।” हर असफलता हमें यह सिखाती है कि अगली बार क्या नहीं करना है। थॉमस एडिसन ने हजारों बार असफल होकर बल्ब बनाया, अब्राहम लिंकन कई चुनाव हारकर राष्ट्रपति बने, और गौतम बुद्ध ने अनेक वर्षों के साधना और भ्रम के बाद ही ज्ञान प्राप्त किया।  यह सभी उदाहरण यही बताते हैं कि असफलता अंत नहीं, बल्कि आरंभ है। संत जी कहते थे — “जीवन की सच्ची सफलता वही है जो असफलताओं की राख से जन्म लेती है।” अर्थात् असफलता हमें परखती है कि हम कितने दृढ़ हैं। जो व्यक्ति असफलता के बाद भी खड़ा रहता है, वही जीवन के युद्ध में विजयी होता है।

छोटे कदमों की शक्ति

अक्सर लोग बड़े परिणाम की चिंता में छोटे कदमों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि महानता कभी अचानक नहीं आती; वह छोटे-छोटे प्रयासों का परिणाम होती है। एक बीज जब मिट्टी में डाला जाता है, तो वह तुरंत वृक्ष नहीं बनता। उसे मिट्टी, पानी, धूप और समय चाहिए।
वैसे ही हमारे छोटे-छोटे प्रयास ही धीरे-धीरे जीवन के महान वृक्ष में बदलते हैं।
संत जी कहते थे —“हर छोटा कदम भविष्य की दिशा तय करता है। इसलिए कोई भी कदम छोटा नहीं होता।”

समय और प्रतीक्षा का भ्रम

कई लोग कहते हैं — “अभी समय सही नहीं है”, “अभी परिस्थिति अनुकूल नहीं है”, “जब हालात सुधरेंगे तब करेंगे।”  लेकिन कश्यप जी स्पष्ट करते हैं कि आदर्श समय कभी नहीं आता। जो व्यक्ति प्रतीक्षा करता है, वह केवल अवसर खोता है। जो व्यक्ति आरंभ करता है, वही अवसर बनाता है।उनके शब्दों में —
“ईश्वर उन लोगों की मदद करता है जो अपने कर्म से समय को सार्थक बनाते हैं।”अर्थात् हमें अपने कर्मों से ही समय को अनुकूल बनाना होता है।

महानता : एक यात्रा, न कि एक मंज़िल

लोग अक्सर सोचते हैं कि महानता किसी उपलब्धि का नाम है — जैसे पद, प्रसिद्धि या धन।  लेकिन संत लहरी सिंह कश्यप जी कहते हैं कि — “महानता परिणाम नहीं, बल्कि उस यात्रा का नाम है जो साहस और कर्म से आरंभ होती है।”जब कोई व्यक्ति एक सच्चे उद्देश्य से, बिना भय के, बिना दिखावे के निरंतर कर्म करता है —तो वह पहले से ही महान है, चाहे समाज उसे पहचाने या नहीं।महानता उस भीतर के संतोष में है जो कर्म से मिलता है, न कि केवल बाहरी उपलब्धियों में।

साहस और आत्मविश्वास का महत्व

कश्यप जी का एक प्रमुख उपदेश था — “साहस ही वह दीपक है जो अंधकार में भी राह दिखाता है।” अक्सर हमारे भीतर डर होता है — असफलता का, उपहास का, आलोचना का। लेकिन यदि हम अपने डर पर विजय पा लें, तो कोई भी राह कठिन नहीं रहती। साहस का अर्थ यह नहीं कि डर नहीं होता, बल्कि यह कि हम डर के बावजूद आगे बढ़ते हैं।जब हम खुद पर विश्वास करते हैं, तब ब्रह्मांड भी हमारे साथ हो जाता है।

कर्मयोग का दर्शन

संत लहरी सिंह जी के विचारों में गीता का ‘कर्मयोग’ गहराई से झलकता है। वे कहते थे — “कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो; क्योंकि जब कर्म सच्चा होता है, तब फल स्वतः मिलता है।” यह वही सिद्धांत है जो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था। जब मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करता है —तब वह न केवल सफल होता है, बल्कि भीतर से भी शांत और संतुष्ट होता है।

संघर्ष से सिद्धि तक : जीवन का क्रम

कश्यप जी के जीवन दर्शन में एक सुंदर क्रम दिखाई देता है —

  1. संघर्ष जीवन का प्रारंभ है।

  2. कर्म उस संघर्ष को दिशा देता है।

  3. प्रयास अनुभव लाता है।

  4. अनुभव सक्षमता बनता है।

  5. सक्षमता सफलता में रूपांतरित होती है।

  6. सफलता आत्मसंतोष देती है।

यह क्रम हमें सिखाता है कि कोई भी मंज़िल एक दिन में नहीं मिलती, लेकिन निरंतरता से सब कुछ संभव है।

जीवन का संदेश : शुरुआत करो, क्योंकि वहीं से बदलाव शुरू होता है

यदि हम जीवन के किसी भी क्षेत्र में देखें — शिक्षा, समाज सेवा, विज्ञान, कला, खेल — हर जगह वही सफल हुआ जिसने शुरुआत करने का साहस किया।
आरंभ में कोई भी महान नहीं होता, लेकिन जो आरंभ करता है, वही महान बनता है। संत लहरी सिंह जी की यह उक्ति इस सत्य को पूर्ण रूप से दर्शाती है —
“शुरुआत ही वह चिंगारी है जो साधारण जीवन को असाधारण बना देती है।” अतः हमें अपने भय, संदेह और प्रतीक्षा की जंजीरों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
क्योंकि कदम उठाए बिना, कोई राह तय नहीं होती।

उपसंहार

संत लहरी सिंह कश्यप जी के विचार हमें यह सिखाते हैं कि जीवन की सुंदरता उसकी कठिनाइयों में छिपी है।
संघर्ष हमें मजबूत बनाता है, कर्म हमें दिशा देता है, और शुरुआत हमें अवसर देती है। पूर्णता, सफलता या महानता की चिंता करने के बजाय, हमें बस पहला कदम उठाना चाहिए। वही पहला कदम हमारी दिशा तय करता है। जो व्यक्ति निरंतर कर्म करता है, असफलता से नहीं डरता और हर अनुभव को सीख बनाकर आगे बढ़ता है  वही सच्चे अर्थों में विजेता है, वही जीवन का साधक है।याद रखिए —“महानता मंज़िल में नहीं, बल्कि उस यात्रा में है, जो हम आरंभ करके पूरे साहस से तय करते हैं।”

✍️ सारांश

  • जीवन संघर्षमय है, पर यही संघर्ष हमें सशक्त करता है।

  • सक्षमता आरंभ की शर्त नहीं, परिणाम है।

  • असफलता अंत नहीं, सीख है।

  • छोटे-छोटे प्रयास ही महानता की नींव हैं।

  • आदर्श समय की प्रतीक्षा व्यर्थ है — आरंभ ही सबसे बड़ा अवसर है।

  • महानता परिणाम नहीं, कर्म की निरंतरता है।

  • और अंत में — “शुरुआत करो, क्योंकि वही तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा निर्णय है।”



रविवार, 26 अक्टूबर 2025

संत लहरी सिंह जी के अनुसार सामाजिक संबंधों का महत्व

संत लहरी सिंह जी के अनुसार सामाजिक संबंधों का महत्व

    भूमिका

मनुष्य का अस्तित्व समाज के बिना अधूरा है। वह न केवल एक जैविक प्राणी है, बल्कि एक सामाजिक चेतना से सम्पन्न प्राणी भी है। मनुष्य के जीवन की सफलता और संतुलन उसके सामाजिक संबंधों पर निर्भर करता है। संत लहरी सिंह जी का मानना था कि मनुष्य की गुणवत्ता, उसका चरित्र और उसका मानसिक संतुलन इस बात से निर्धारित होता है कि उसके समाज के साथ संबंध कितने प्रगाढ़, सहज और सहयोगपूर्ण हैं।
उनके अनुसार, “समाज केवल व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि व्यक्ति भी समाज के लिए है।” यह परस्पर निर्भरता ही जीवन की वास्तविकता है।

1. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी — लहरी सिंह जी का दृष्टिकोण

संत लहरी सिंह जी कहते थे कि मनुष्य की प्रकृति में ही सामाजिकता निहित है। वह जन्म से ही दूसरों के सहारे जीना सीखता है। माँ की गोद, पिता का संरक्षण, परिवार का स्नेह, पड़ोस का सहयोग और मित्रता का भाव — ये सब सामाजिकता के रूप हैं। मनुष्य चाहे जितना भी आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करे, वह समाज से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। उसकी सोच, भाषा, व्यवहार और संस्कार — सब समाज से ही निर्मित होते हैं। वे कहते थे—“व्यक्ति के अस्तित्व की जड़ें समाज की मिट्टी में ही पोषित होती हैं। यदि वह मिट्टी सूख जाए तो व्यक्ति की चेतना भी सूख जाती है।”

2. सामाजिक संबंधों की व्यापकता और प्रगाढ़ता

संत लहरी सिंह जी के विचारों में केवल संबंधों का होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका गुणवत्ता पूर्ण और भावनात्मक रूप से सशक्त होना आवश्यक है।
वे मानते थे कि यदि व्यक्ति का सामाजिक दायरा व्यापक हो, तो वह न केवल स्वयं सुरक्षित रहता है बल्कि समाज की एकता में भी योगदान देता है।
व्यक्ति और समाज के बीच जितना अधिक संवाद और सहयोग बढ़ेगा, उतना ही समाज में सह-अस्तित्व की भावना सुदृढ़ होगी। उनके अनुसार—“संबंध तभी सार्थक हैं जब वे स्वार्थरहित, सहानुभूतिपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण हों।”

3. सामाजिक संबंधों के लाभ

संत लहरी सिंह जी ने समाज से मिलने वाले लाभों को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा। उन्होंने मनुष्य के भावनात्मक, मानसिक और नैतिक कल्याण को सर्वोपरि माना।
उन्होंने कहा कि समाज से व्यक्ति को ऐसे अमूल्य लाभ मिलते हैं जो धन-संपत्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इनमें प्रमुख हैं—

(क) सुरक्षा और संरक्षण

समाज व्यक्ति को भौतिक और मानसिक दोनों प्रकार की सुरक्षा देता है। संकट के समय, आपदा में, बीमारी या दुःख के क्षणों में समाज के लोग सहायता करते हैं। यह संरक्षण व्यक्ति के आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

(ख) मार्गदर्शन और सलाह

समाज के वरिष्ठ, अनुभवी या शिक्षित लोग नए पीढ़ी को दिशा देते हैं। सामाजिक परामर्श से व्यक्ति कई गलत निर्णयों से बचता है।

(ग) सहयोग और सामूहिकता का आनंद

त्योहार, सामूहिक कार्यक्रम, धार्मिक आयोजन और जनकल्याण कार्य— ये सब मनुष्य को आपसी मेलजोल का अवसर देते हैं। इससे जीवन में उल्लास और ऊर्जा बनी रहती है।

(घ) मानसिक स्थिरता

संत लहरी सिंह जी के अनुसार, सामाजिक संबंध मनुष्य को मानसिक रोगों से भी बचाते हैं। अकेलापन, अवसाद और चिंता अक्सर उन्हीं में पनपते हैं जो समाज से कटे होते हैं।

(ङ) चरित्र निर्माण और आत्मनियंत्रण

समाज की परंपराएँ और मर्यादाएँ व्यक्ति को अनुशासित रखती हैं। सामाजिक नियंत्रण बुरा नहीं, बल्कि व्यक्ति को संतुलित बनाता है।

4. समाज में निषेधों की आवश्यकता

संत लहरी सिंह जी ने यह भी स्वीकार किया कि समाज अपने सदस्यों के लिए कुछ मर्यादाएँ और निषेध तय करता है। ये निषेध किसी की स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए होते हैं।  उन्होंने कहा—“व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक उचित है जहाँ तक वह दूसरों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करे।” इसलिए, समाज के कुछ प्रतिबंध वस्तुतः व्यक्ति के हित में होते हैं।उदाहरण के लिए — चोरी, हिंसा, व्यभिचार, असत्य भाषण जैसे कर्मों पर सामाजिक रोक मानवता की रक्षा के लिए ही है। यदि समाज इन निषेधों को न रखे, तो व्यक्ति अपनी इच्छाओं के वश होकर स्वयं को भी नष्ट कर देगा।

5. समाज से दूरी और उसके परिणाम

संत लहरी सिंह जी का स्पष्ट मत था कि जो लोग समाज को “अपनी स्वतंत्रता में बाधक” मानते हैं, वे जीवन की गहराई को नहीं समझते।
वे कहते थे—“समाज से दूर होना स्वतंत्रता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आत्मविनाश की ओर बढ़ना है। ऐसे लोग धीरे-धीरे एकाकी हो जाते हैं।
उनके पास न तो कठिन समय में कोई सहारा होता है, न मानसिक शांति। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जब व्यक्ति केवल भौतिकता में उलझ जाता है, तो उसके भीतर खालीपन और असुरक्षा का भाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि आज मानसिक रोग, तनाव और आत्महत्या जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं।

6. सामाजिक संबंध और मानसिक स्वास्थ्य

संत लहरी सिंह जी के विचारों की पुष्टि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सिद्धांतों से भी होती है।
WHO ने कहा है कि “मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए अच्छे सामाजिक संबंध आवश्यक हैं।”
सामाजिक संबंध व्यक्ति को भावनात्मक सहारा देते हैं। वे जीवन में उद्देश्य और पहचान का बोध कराते हैं।
जब मनुष्य संवाद करता है, साझा करता है, सहानुभूति रखता है — तब उसका मानसिक स्वास्थ्य सुदृढ़ रहता है।

7. पारस्परिक संवाद और सहनशीलता का महत्व

संत लहरी सिंह जी सामाजिक संबंधों के दो मुख्य स्तंभ बताते थे — संवाद और सहनशीलता।
उनका कहना था कि जब तक संवाद जीवित है, तब तक संबंध जीवित हैं। संवाद के माध्यम से गलतफहमियाँ मिटती हैं, मतभेद सुलझते हैं और एक-दूसरे की भावनाओं की समझ विकसित होती है। सहनशीलता का अर्थ है — दूसरों की सोच, संस्कार और अनुभव को सम्मान देना। वे कहते थे—“जहाँ सहनशीलता नहीं, वहाँ समाज नहीं। वहाँ केवल टकराव और विनाश है।”

8. आधुनिक संदर्भ में सामाजिक संबंधों की चुनौती

आज के समय में तकनीक और व्यस्तता ने व्यक्ति को समाज से दूर कर दिया है। सोशल मीडिया के आभासी संपर्क वास्तविक संबंधों की जगह ले रहे हैं। लोग ‘कनेक्टेड’ तो हैं, लेकिन ‘जुड़े हुए’ नहीं हैं।
संत लहरी सिंह जी यदि आज होते तो वे यही कहते कि—“संपर्क की अधिकता ने संवाद को मार दिया है।” आज समाज में पारिवारिक विघटन, एकल परिवार, और प्रतिस्पर्धा की भावना ने सामाजिक एकता को कमजोर किया है।
ऐसे में उनके विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं — कि व्यक्ति को अपने समाज से पुनः सजीव रूप में जुड़ना चाहिए।

9. संत लहरी सिंह जी के विचारों की दार्शनिक व्याख्या

उनकी दृष्टि केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी थी। वे समाज को केवल भौतिक समूह नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत चेतना समझते थे। उनके अनुसार, समाज आत्मा की तरह है और व्यक्ति उसका शरीर। यदि शरीर आत्मा से अलग हो जाए तो वह मृत हो जाता है। इसी प्रकार समाज से कटा हुआ व्यक्ति भी आध्यात्मिक रूप से निर्जीव हो जाता है। वे कहते थे—“समाज में रहना साधना है, क्योंकि वहीं से सेवा, करुणा और प्रेम की अनुभूति होती है।”

10. सामाजिक संबंधों में कर्तव्य का भाव

संत लहरी सिंह जी ने यह भी कहा कि समाज से केवल लेने की नहीं, बल्कि देने की भावना भी होनी चाहिए।
सामाजिक संबंध केवल अधिकारों पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों पर भी आधारित होते हैं।
वे व्यक्ति से अपेक्षा करते थे कि वह समाज के लिए समय, सेवा और सहयोग दे।
क्योंकि यह देना ही लेने की प्रक्रिया का आधार है।
जब व्यक्ति समाज के लिए योगदान देता है, तब समाज भी उसके लिए शक्ति बन जाता है।

11. लहरी सिंह जी के विचारों का आधुनिक महत्व

आज जब मानव संबंध उपभोक्तावादी दृष्टिकोण से प्रभावित हैं, तब संत लहरी सिंह जी की शिक्षाएँ और भी आवश्यक हैं।
वे हमें सिखाते हैं कि सामाजिकता केवल परंपरा नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य की आवश्यकता है।
उनके विचार हमें बताते हैं कि—

  • सच्ची स्वतंत्रता, समाज से जुड़ाव में ही है।

  • संवाद और सहनशीलता से ही सामंजस्य संभव है।

  • सामाजिक संबंध जीवन के संतुलन का सबसे मजबूत आधार हैं।

12. निष्कर्ष

संत लहरी सिंह जी के अनुसार, मनुष्य के जीवन की सुंदरता उसके सामाजिक संबंधों से ही प्रकट होती है।
समाज व्यक्ति को सुरक्षा, सम्मान, दिशा और ऊर्जा देता है, जबकि व्यक्ति अपनी सेवा और सद्भावना से समाज को सशक्त बनाता है।
समाज और व्यक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं।
समाज से कटकर व्यक्ति का जीवन न तो पूर्ण है, न सुखद।  इसलिए उन्होंने कहा “जो समाज से जुड़ा है, वही स्वयं से जुड़ा है; और जो स्वयं से जुड़ा है, वही परमात्मा से जुड़ सकता है।” आज भी यदि हम उनके इन विचारों को अपनाएँ — संवाद, सहानुभूति, सहयोग और सहनशीलता के माध्यम से — तो न केवल समाज का स्वास्थ्य सुधरेगा, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन भी संतुलित, शांत और सुखमय बन सकेगा।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

माया और मोह से मुक्ति का मार्ग : संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों में आत्म-ज्ञान का आलोक"

"माया और मोह से मुक्ति का मार्ग : संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों में आत्म-ज्ञान का आलोक"


 भूमिका

मानव जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक उपभोग नहीं, बल्कि आत्मा की उस शाश्वत स्वतंत्रता को प्राप्त करना है, जो माया और मोह के आवरण से परे स्थित है। संत लहरी सिंह कश्यप जी का दर्शन इसी सत्य का उद्घोष करता है। वे कहते हैं कि माया और मोह अनायास ही अंतःकरण में प्रविष्ट होकर जीवन को दुख, दैन्य और चिरकालिक असंतोष के भंवर में धकेल देते हैं। यह मोह ही है जो जीवन की प्रत्येक अवस्था को अपनी काली छाया से ढक लेता है और मनुष्य को आत्म-ज्ञान से विमुख कर देता है।

संत परंपरा में सदैव यह कहा गया है कि “मोह मूलं सर्व दुःखानां” — मोह ही सभी दुखों का मूल कारण है। परंतु आज का मनुष्य, विज्ञान और भौतिकता के युग में, उसी मोह को ‘सफलता’ और ‘सुख’ का पर्याय मान बैठा है। संत लहरी सिंह कश्यप जी का संदेश इसी अंधकार में प्रकाशपुंज की भाँति है, जो हमें आत्म-ज्ञान की ज्योति से परिचित कराता है।

🌸 माया और मोह का वास्तविक स्वरूप

‘माया’ शब्द का अर्थ केवल धन या भौतिक वस्तुओं से नहीं है; यह उस भ्रम का नाम है जो सत्य को असत्य और असत्य को सत्य रूप में प्रस्तुत करता है। माया वह पर्दा है जो हमें परमात्मा की सत्ता से दूर रखता है और हमें संसार की अस्थायी वस्तुओं में स्थायित्व का भ्रम कराता है।

संत लहरी सिंह कश्यप जी कहते हैं कि —

"मोह जीवन के प्रत्येक पड़ाव को अपनी काली छाया से ढक लेता है। बाल्यकाल चंचल क्रीड़ाओं में, युवावस्था भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में और वृद्धावस्था स्मृतियों के मोह में बीत जाती है।"

मोह, मनुष्य के हृदय में उस झूठी आसक्ति का भाव उत्पन्न करता है जो ‘मेरा’ और ‘तेरा’ के भेद को जन्म देती है। यही विभाजन संसार में संघर्ष, ईर्ष्या और अशांति का कारण बनता है।

🌼 मोह की जड़ें : “मेरा–तेरा” का भ्रम

जब मनुष्य अपने अस्तित्व को शरीर, संपत्ति और संबंधों तक सीमित कर लेता है, तभी मोह की जड़ें पल्लवित होती हैं। यह मोह ही है जो हमें आत्मा की अनंतता से काट देता है।

हम कहते हैं — “मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा धर्म, मेरा देश।” परंतु यह ‘मेरा’ का भाव ही हमें सार्वभौमिक प्रेम और करुणा से दूर कर देता है। संत लहरी सिंह कश्यप जी स्पष्ट करते हैं कि जहाँ ‘स्व’ का संकीर्ण अंत होता है, वहीं सच्चे प्रेम और आत्मीयता का शुभोदय होता है।

अर्थात, जब मनुष्य अपने ‘अहं’ से मुक्त होकर दूसरों के सुख-दुःख में एकाकार होता है, तभी प्रेम का बीज अंकुरित होता है। अन्यथा हमारे संबंध केवल लेन-देन का व्यापार बनकर रह जाते हैं — जिसमें भावना नहीं, गणना होती है।

🌻 भौतिकता की अंधी दौड़

वर्तमान युग में मनुष्य का जीवन बाहरी उपलब्धियों की मृगतृष्णा में उलझा हुआ है। संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति की लालसा ने उसकी अंतःशांति को छीन लिया है।

संत जी कहते हैं कि —

“आज प्रश्न यह नहीं है कि हम कितना संग्रह कर रहे हैं, अपितु यह है कि क्या हम माया-मोह की गहरी नींद में जी रहे हैं या आत्मा की शाश्वत स्वतंत्रता की ओर उन्मुख हैं?”

यह वाक्य आधुनिक सभ्यता के मूल रोग पर प्रहार करता है। मनुष्य ने विज्ञान के माध्यम से संसार को जीत लिया, किंतु अपने मन को पराजित कर दिया। भौतिक सुविधाएँ बढ़ीं, परंतु मानसिक संतोष समाप्त हो गया।

🌺 सत्संग और आत्म-ज्ञान का महत्व

संत लहरी सिंह कश्यप जी का स्पष्ट मत है कि मोह-जाल से मुक्ति का एकमात्र मार्ग आत्म-ज्ञान है।
आत्म-ज्ञान का अर्थ केवल दार्शनिक चिंतन नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव है। यह अनुभव तभी संभव है जब मनुष्य सत्संग, स्वाध्याय और ध्यान के मार्ग पर चले।

“सत्संग” वह दिव्य संगति है, जहाँ हमें अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा मिलती है। धर्मशास्त्रों के गहन अध्ययन और संत-महापुरुषों के संग से मन का अंधकार मिटता है। यही वह दीपक है जो माया-मोह के आवरण को चीरकर आत्मा के प्रकाश को प्रकट करता है।

🌼 निस्वार्थ कर्म : मुक्ति का माध्यम

संत जी यह भी कहते हैं कि केवल ज्ञान ही नहीं, निष्काम कर्म भी मुक्ति का माध्यम है।
जब मनुष्य निस्वार्थ भाव से, बिना फल की चिंता किए, अपने कर्तव्य का पालन करता है, तब वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।

भगवद्गीता में भी यही उपदेश है —

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

माया और मोह तब ही नष्ट होते हैं जब हम कर्म करते हुए भी अपने को ‘कर्ता’ नहीं मानते। कर्म को ईश्वरार्पण समझकर किया गया कार्य आत्म-ज्ञान का सेतु बन जाता है।

🌿 प्रेम और करुणा की पुनर्स्थापना

संत लहरी सिंह कश्यप जी का दर्शन केवल विरक्ति का नहीं, बल्कि सक्रिय प्रेम का भी है। वे कहते हैं कि जब तक हम प्रेम, सम्मान और संबंधों के आध्यात्मिक मूल्य को नहीं समझते, तब तक सच्ची शांति असंभव है।

प्रेम कोई भावना नहीं, बल्कि आत्मा का स्वाभाविक गुण है। यह तब प्रकट होता है जब मनुष्य ‘स्वार्थ’ के बंधन से मुक्त होकर ‘परमार्थ’ की दिशा में अग्रसर होता है। प्रेम का अर्थ है — किसी को अपनाने की क्षमता, बिना किसी अपेक्षा के।

🌸 आत्मा की शाश्वत स्वतंत्रता

आत्मा सदा स्वतंत्र है — न वह जन्म लेती है, न मरती है। परंतु जब मनुष्य अपने को शरीर या मन से जोड़ देता है, तब बंधन की अनुभूति होती है। यह बंधन वास्तव में माया का ही भ्रम है।

संत जी कहते हैं कि जब आत्म-ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होता है, तब यह भ्रम अपने आप मिट जाता है। तब व्यक्ति समझता है कि संसार न तो शत्रु है, न मित्र — वह केवल कर्मभूमि है जहाँ आत्मा अपने अनुभवों से विकसित होती है।

🌺 आधुनिक संदर्भ में संत लहरी सिंह कश्यप जी की प्रासंगिकता

आज का समाज तकनीक, प्रतिस्पर्धा और उपभोग की संस्कृति में उलझा हुआ है। लोग संबंधों में भावनाओं की जगह ‘उपयोगिता’ खोजते हैं। धर्म केवल परंपरा बनकर रह गया है, और आत्मा की खोज उपेक्षित है।

ऐसे समय में संत लहरी सिंह कश्यप जी के विचार जीवन में नई दिशा देते हैं। वे कहते हैं —

“हमें प्रेम, सम्मान और संबंधों के आध्यात्मिक, अपरिमेय मूल्य को हृदयंगम करना होगा।”

यह कथन केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक नीति है। यदि हम इसे अपनाएँ, तो समाज में करुणा, सहयोग और संतुलन का वातावरण बनेगा।

🌿 मोह से मुक्ति की साधना

माया-मोह से मुक्ति कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सतत साधना है।
यह साधना तीन चरणों में फलित होती है —

  1. विवेक (Discrimination):
    सत्य और असत्य का भेद जानना। यह समझना कि जो बदलता है वह असत्य है, और जो न बदलने वाला है वही सत्य है।

  2. वैराग्य (Detachment):
    जो असत्य है, उससे मन को हटा लेना। यह त्याग नहीं, बल्कि सही दिशा में प्रवृत्ति का परिवर्तन है।

  3. ध्यान और समर्पण (Meditation & Surrender):
    आत्मा के प्रति एकाग्र होना और अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना।

जब ये तीनों साधन पूर्ण होते हैं, तब माया का आवरण हटता है और आत्मा का तेज प्रकाशित होता है।

🌼 आत्म-ज्ञान का प्रकाश : जीवन का परम लक्ष्य

आत्म-ज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अनुभवजन्य सत्य है। यह वह अवस्था है जब मनुष्य अपने भीतर उस परम चेतना को पहचान लेता है, जो सदा शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।

संत लहरी सिंह कश्यप जी के शब्दों में —

“जब हम निस्वार्थ भाव से जीवन जीने का संकल्प लेकर कर्म करते हैं, तभी हम उस शाश्वत शांति और मोक्ष के परम द्वार तक पहुँच सकते हैं, जहाँ माया का भ्रम और मोह का बंधन स्वतः ही क्षीण हो जाता है।”

यह वाक्य आत्म-ज्ञान की पराकाष्ठा का साक्षात् चित्रण करता है।

🌺 उपसंहार

संत लहरी सिंह कश्यप जी का दर्शन केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का व्यावहारिक विज्ञान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माया और मोह से ग्रस्त मनुष्य कभी भी सच्चे सुख को प्राप्त नहीं कर सकता। जब तक जीवन का केंद्र ‘स्वार्थ’ रहेगा, तब तक असंतोष बना रहेगा।

परंतु जब वही मनुष्य आत्म-ज्ञान की ज्योति में जगता है, तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। वह बाहरी संसार में रहते हुए भी भीतर से मुक्त हो जाता है। यही वास्तविक मोक्ष है — मुक्ति भीतर रहते हुए भी बंधन से परे होने की।

संत लहरी सिंह कश्यप जी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना युगों पहले उपनिषदों का था —
कि “सत्य, शांति और प्रेम” आत्मा के स्वभाव हैं, और इन्हें पाने के लिए हमें माया और मोह के अंधकार से बाहर आना होगा।

✨ निष्कर्ष

यदि हम आत्म-ज्ञान की दिशा में अग्रसर हों, सत्संग का सहारा लें, और निस्वार्थ कर्म का पालन करें, तो हमारा जीवन भी उसी दिशा में विकसित हो सकता है जैसा संत लहरी सिंह कश्यप जी ने दिखाया —
जहाँ मन शुद्ध हो, संबंध पवित्र हों और आत्मा मुक्त।

यही जीवन की सर्वोच्च साधना है।
यही माया और मोह से मुक्ति का पथ है।
और यही संत लहरी सिंह कश्यप जी के उपदेशों का अमर सार है।

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्यतिथि : प्रतिज्ञा दिवस के रूप में मनाई गई

 संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्यतिथि : प्रतिज्ञा दिवस के रूप में मनाई गई

12 अक्टूबर 2017 का दिन लहरीपुर (जनपद शामली, उत्तर प्रदेश) के इतिहास में एक प्रेरणादायी दिवस के रूप में दर्ज है। इस दिन गाँव के संस्थापक, समाज सुधारक और शिक्षा-समता के प्रतीक संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्यतिथि बड़े ही श्रद्धा, उत्साह और एकजुटता के साथ “प्रतिज्ञा दिवस” के रूप में मनाई गई।

लहरीपुर गाँव, जो संत लहरी सिंह कश्यप जी की दूरदर्शिता, परिश्रम और समाज-निष्ठा का सजीव उदाहरण है, इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं, अनुयायियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मंच के पदाधिकारियों से खचाखच भरा हुआ था। यह केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि संकल्प और सामाजिक चेतना का संगम था।

 कार्यक्रम की शुरुआत — श्रद्धांजलि और संकल्प

सुबह से ही श्रद्धालु और अनुयायी गाँव के प्रमुख स्थल पर एकत्रित होने लगे। संत जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद सामूहिक रूप से सभी ने सिर झुकाकर मौन श्रद्धांजलि दी और उनके जीवन के आदर्शों को आत्मसात करने की प्रतिज्ञा दोहराई। मंच संचालन के दौरान वक्ताओं ने संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन दर्शन और उनके समाज सुधार संबंधी कार्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संत जी का उद्देश्य केवल एक गाँव बसाना नहीं था, बल्कि एक ऐसी चेतना का निर्माण करना था जिसमें शिक्षा, समानता और आत्मनिर्भरता की भावना केंद्र में हो।

 मुख्य अतिथि और गणमान्य जनों की उपस्थिति

इस अवसर पर कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से अनेक समाजसेवी, कार्यकर्ता और पदाधिकारी उपस्थित हुए।
मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मंत्री श्री किरणपाल कश्यप उपस्थित रहे। उन्होंने संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन दर्शन को “समानता का मार्गदर्शक” बताते हुए कहा —“संत लहरी सिंह कश्यप जी ने जो विचार दिए, वे केवल कश्यप समाज के नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। आज समाज में शिक्षा और एकता की ज्योति जलाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।”कार्यक्रम में श्री गुरचरण सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय कश्यप निषाद मल्लाह विकास मंच, ने संगठन की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि संत जी ने अपने जीवनकाल में जो कार्य किए, वे आज भी समाज के हर वर्ग को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने कहा —“लहरीपुर केवल एक गाँव नहीं, बल्कि वह विचारभूमि है जहाँ से समाज सुधार की क्रांति प्रारंभ हुई थी।”

इसके साथ ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री बी. एल. मेहरा और राष्ट्रीय मंत्री श्री सुखबीर सिंह ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर समाज में शिक्षा और जागरूकता फैलाने की अपील की।चौधरी भोपालसिंह ने युवाओं का आह्वान किया

 देश के विभिन्न राज्यों से पहुँचे अनुयायी

इस अवसर पर केवल शामली जनपद ही नहीं, बल्कि पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा से भी मंच के कार्यकर्ता, अनुयायी और पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए।

सभी ने एक स्वर में संत लहरी सिंह कश्यप जी के दिखाए मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा दोहराई।
यह दृश्य अत्यंत प्रेरणादायी था जब सैकड़ों लोग एक साथ खड़े होकर बोले —

“हम समाज में समानता, शिक्षा और एकता का प्रकाश फैलाएँगे, और मानवता की सेवा के लिए समर्पित रहेंगे।”

यह प्रतिज्ञा केवल शब्दों की नहीं, बल्कि संघर्ष और समर्पण की भावना से भरी हुई थी।

 संत लहरी सिंह कश्यप जी की विचारधारा

संत लहरी सिंह कश्यप जी ने अपना संपूर्ण जीवन समाज के उत्थान और शिक्षा के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। उनका मानना था कि अज्ञानता ही समाज की सबसे बड़ी जंजीर है। उन्होंने हमेशा कहा कि “जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह सशक्त नहीं हो सकता।”

लहरीपुर गाँव की स्थापना उन्होंने इस उद्देश्य से की थी कि यह गाँव शिक्षा, श्रम और समानता का केंद्र बने।
उन्होंने लोगों को जाति, धर्म या भाषा के भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे की सहायता करने का संदेश दिया।

उनकी प्रेरणा से लहरीपुर में शिक्षा, कृषि और सामाजिक सहयोग के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य हुए। गाँव आज भी उनके आदर्शों की सजीव मिसाल है।

 कार्यक्रम का वातावरण और जनसहभागिता

पुण्यतिथि कार्यक्रम में मंच सुसज्जित था, जिसमें संत जी के जीवन चित्र प्रदर्शित किए गए। कार्यक्रम के दौरान भजन, विचार गोष्ठी और सामाजिक प्रतिज्ञा का आयोजन हुआ।
कई वक्ताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि संत लहरी सिंह कश्यप जी ने किस प्रकार जीवन भर निःस्वार्थ भाव से कार्य किए।

स्थानीय लोगों ने कार्यक्रम की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। महिलाओं और युवाओं ने भी बड़े उत्साह से भाग लिया।
कार्यक्रम में उपस्थित अनुयायियों ने कहा कि “यह दिवस हमें हर वर्ष यह याद दिलाता है कि हमारी पहचान हमारे कर्म और शिक्षा से बनती है।”

 प्रतिज्ञा दिवस का महत्व

12 अक्टूबर को “प्रतिज्ञा दिवस” के रूप में मनाने की परंपरा समाज में एक नई चेतना लाती है।
इस दिन लोग यह संकल्प लेते हैं कि वे समाज में भेदभाव, अंधविश्वास और असमानता के खिलाफ आवाज़ उठाएँगे।
संत लहरी सिंह कश्यप जी के विचारों पर आधारित यह दिवस अब केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का प्रतीक बन चुका है।

 अंतिम चरण — आभार और समापन

कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया। सामूहिक रूप से फिर से प्रतिज्ञा दोहराई गई कि

“हम संत लहरी सिंह कश्यप जी के विचारों को हर गाँव, हर घर तक पहुँचाएँगे और शिक्षा, समानता, एकता के उनके संदेश को जन-जन तक फैलाएँगे।”

कार्यक्रम का समापन पुष्पांजलि और भजन-कीर्तन के साथ हुआ। सभी श्रद्धालु और कार्यकर्ता संत जी की प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक होकर अपने भीतर एक नई ऊर्जा और प्रेरणा लेकर लौटे।

 सारांश

संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्यतिथि “प्रतिज्ञा दिवस” के रूप में न केवल एक स्मरण दिवस थी, बल्कि यह नए समाज निर्माण का आह्वान थी।
लहरीपुर की धरती ने उस दिन फिर से वही संदेश दिया जो संत जी ने जीवन भर दिया था —

“शिक्षा ही मुक्ति का मार्ग है, और एकता ही समाज की शक्ति।”

 स्थान: लहरीपुर, जनपद शामली
तिथि: 12 अक्टूबर 2017
अवसर: चौथी पुण्यतिथि — प्रतिज्ञा दिवस
  मुख्य अतिथि:

  • पूर्व मंत्री श्री किरणपाल कश्यप

  • श्री गुरचरण सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष — अखिल भारतीय कश्यप निषाद मल्लाह विकास मंच

  • श्री बी. एल. मेहरा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

  • श्री सुखबीर सिंह, राष्ट्रीय मंत्री

 प्रतिनिधित्व: पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा सहित विभिन्न राज्यों के कार्यकर्ता और अनुयायी


आलस्य का अभिशाप : संत लहरी सिंह कश्यप का प्रेरक संदेश

भूमिका

जीवन कर्म का पर्याय है। संसार में जो कुछ भी विकसित हुआ है, वह परिश्रम का ही परिणाम है। जिस व्यक्ति में कर्म करने की प्रवृत्ति नहीं होती, वह जीवन की दौड़ में पीछे रह जाता है। मानव जीवन की उपजाऊ भूमि तब ही फलदायी होती है जब उसमें कर्म और संकल्प के बीज बोए जाएँ। किंतु जब यह भूमि आलस्य की बंजरता से भर जाती है, तब जीवन निष्प्रभावी और निरर्थक हो जाता है।  संत लहरी सिंह कश्यप ने कहा था —“जीवन की उपजाऊ भूमि आलस्य से अनुर्वर हो जाती है।” उनके इस वाक्य में निहित गूढ़ अर्थ यह है कि आलस्य मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। यह व्यक्ति के पुरुषार्थ, प्रतिभा और सामर्थ्य को नष्ट कर देता है।

आलस्य का स्वरूप और उसके परिणाम

  आलस्य केवल शारीरिक निष्क्रियता नहीं, बल्कि मानसिक जड़ता भी है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ मनुष्य जानते हुए भी कार्य करने से कतराता है।
आलसी व्यक्ति सदैव सोचता रहता है कि “कल कर लेंगे”, “थोड़ी देर बाद करेंगे”, लेकिन वह “कल” कभी आता नहीं। इस प्रकार उसका जीवन ‘टालमटोल’ की आदत में बीत जाता है।संत लहरी सिंह कश्यप कहते थे —“आलसी व्यक्ति अकर्मण्यता के वशीभूत होकर असफल होता है और फिर अपने भाग्य को कोसता रहता है।” वास्तव में आलसी व्यक्ति के जीवन में सफलता का कोई स्थान नहीं होता। वह जो कर सकता है, वही नहीं करता और जो नहीं कर सकता, उसका सपना देखता रहता है। परिणामस्वरूप वह असंतोष, अपराधबोध और आत्मग्लानि में डूब जाता है।

कार्य को टालने की प्रवृत्ति : आत्मविनाश का मार्ग

टालमटोल करना एक आदत बन जाती है। शुरू में यह सामान्य लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह मनुष्य की इच्छाशक्ति को खा जाती है। संत लहरी सिंह कश्यप ने इस स्थिति का सजीव वर्णन किया था —“वह कार्य को टालता रहता है और टलते-टलते कार्य का बोझ पहाड़ जैसा हो जाता है। फिर आसान कार्य भी असंभव लगने लगता है।”जब काम का ढेर बढ़ जाता है, तब व्यक्ति में हताशा घर करने लगती है। उसे समझ नहीं आता कि शुरुआत कहाँ से करे। यही दुविधा उसकी मानसिक शांति को भंग कर देती है। धीरे-धीरे वह चिड़चिड़ा और असंतुलित हो जाता है।

आलस्य और हीन भावना का सम्बन्ध

  आलस्य न केवल शारीरिक निष्क्रियता लाता है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मविश्वासहीन भी बना देता है।
जब कोई व्यक्ति काम नहीं करता, तो दूसरों की प्रगति देखकर उसे अपने ही जीवन पर संदेह होने लगता है। वह सोचता है कि “मैं तो कुछ नहीं कर पाऊँगा।”
यही भावना उसे धीरे-धीरे हीनता के गर्त में धकेल देती है। संत लहरी सिंह कश्यप ने कहा —“आलसी व्यक्ति धीरे-धीरे हीन भावना का भी शिकार होता जाता है, क्योंकि उसके साथ रहने वाले लोग अपना काम पूरा कर निश्चिंत रहते हैं।”आलसी व्यक्ति की यह मानसिक अवस्था उसे समाज से भी दूर कर देती है। वह दूसरों की प्रगति से ईर्ष्या करने लगता है, पर स्वयं को सुधारने का साहस नहीं जुटा पाता।

अवसरों का खो जाना

जीवन अवसरों का नाम है। अवसर वही पहचानता है जो कर्मशील होता है। जो व्यक्ति आज का काम कल पर टाल देता है, वह जीवन की अनेक संभावनाओं से वंचित रह जाता है। संत जी कहते थे —“आज का काम कल पर टालने की वजह से बहुत सारे अवसरों से व्यक्ति वंचित हो जाता है।” समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो समय का सम्मान नहीं करता, वह पीछे छूट जाता है। अवसर जब निकल जाता है, तब पछतावा ही शेष रह जाता है। आलसी व्यक्ति यही सोचता रहता है कि “अभी समय है”, लेकिन जब समय निकल जाता है, तो उसके पास न साधन बचते हैं, न संकल्प।

आलस्य से पराधीनता और निर्भरता का जन्म

आलसी व्यक्ति धीरे-धीरे दूसरों पर निर्भर हो जाता है। वह चाहता है कि कोई और उसका काम कर दे। लेकिन दुनिया में हर कोई अपने काम में व्यस्त है।
संत लहरी सिंह कश्यप ने चेतावनी दी थी —“जो मनुष्य सहायता के लिए दूसरों पर निर्भर रहे, वह कभी स्वावलंबी नहीं हो सकता।” स्वावलंबन मनुष्य का सर्वोत्तम गुण है। जो स्वयं पर निर्भर होता है, वही सच्चा स्वतंत्र होता है। लेकिन आलसी व्यक्ति दूसरों की दया पर जीवित रहता है। उसका आत्मसम्मान धीरे-धीरे मर जाता है।

मन को वश में करना आवश्यक

आलस्य से मुक्ति पाने के लिए मन को वश में करना अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना मन है। जब मन किसी काम में नहीं लगता, तब व्यक्ति को उसी क्षण अपने मन पर नियंत्रण करना चाहिए।  संत लहरी सिंह कश्यप का मत था —“जब यह तय है कि कोई काम हमें ही करना है और मन काम में रम नहीं रहा तो मन को वश में करके संबंधित कार्य में लग जाना चाहिए।”मन को वश में करना साधना है। जब हम अपनी मानसिक ऊर्जा को कार्य में लगाते हैं, तब धीरे-धीरे आलस्य समाप्त होने लगता है। मनुष्य के अंदर नई चेतना और उमंग का संचार होता है।

कर्म में सक्रियता ही सफलता का मार्ग है

कर्म करने की आदत ही व्यक्ति को महान बनाती है। जो व्यक्ति निरंतर काम में लगा रहता है, वह असंभव को भी संभव बना देता है।  संत जी ने कहा था —“काम में निरंतर सक्रिय रहने पर कठिन से कठिन चीज भी सरल लगने लगती है।” सक्रियता से व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ता है। जब वह अपने प्रयासों से सफलता प्राप्त करता है, तो उसमें नई ऊर्जा का संचार होता है। काम पूरा होने पर जो आनंद और संतोष मिलता है, वह किसी भौतिक वस्तु से नहीं मिल सकता।

कर्म का आनंद और आत्मसंतोष

कर्म करने का सबसे बड़ा पुरस्कार उसका परिणाम नहीं, बल्कि कर्म का आनंद है। जब व्यक्ति अपना कार्य पूरी लगन से करता है, तो उसे भीतर से संतोष मिलता है। संत लहरी सिंह कश्यप कहते थे —“जब काम पूरा हो जाता है तो असीम आनंद की अनुभूति होती है। एक उपलब्धि अर्जित हुई लगती है।”यह आनंद आत्मविश्वास को बढ़ाता है और व्यक्ति को अगली चुनौतियों के लिए तैयार करता है। जो व्यक्ति काम के प्रति समर्पित रहता है, उसका जीवन सार्थक बन जाता है।

समाज में कर्मठ व्यक्ति का सम्मान

समाज में वही व्यक्ति प्रतिष्ठा पाता है जो कर्मठ होता है।
संत जी ने कहा था —“समाज में कर्मठ व्यक्ति का ही महत्व होता है। उसके पुरुषार्थ एवं प्रयासों की सराहना होती है।”कर्मठ व्यक्ति अपने कर्म से समाज में प्रेरणा फैलाता है। उसकी पहचान उसके वचन से नहीं, बल्कि उसके कर्म से होती है। इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने परिश्रम और कर्म को जीवन का आधार बनाया, वही समाज के नायक बने।इसके विपरीत, आलसी व्यक्ति उपेक्षा और तिरस्कार का पात्र बनता है। समाज उसे महत्व नहीं देता, क्योंकि उसने स्वयं को महत्वहीन बना लिया होता है।

कर्मठता : सफलता का मूल मंत्र

कर्मठता केवल कार्य करने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि यह एक जीवन-दर्शन है। यह अनुशासन, निष्ठा और समयबद्धता का प्रतीक है। G संत लहरी सिंह कश्यप ने कहा था —“समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए कर्मठता का परिचय आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।” कर्मठ व्यक्ति समय की कीमत समझता है। वह हर कार्य को नियोजित ढंग से करता है। उसकी सफलता उसका आभूषण बनती है। वह दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है।

आलस्य का मनोवैज्ञानिक पक्ष

आलस्य केवल आदत नहीं, यह एक मानसिक रोग की तरह फैलता है। जब व्यक्ति किसी काम को करने में असफल होता है, तो उसके मन में भय और असफलता की भावना जन्म लेती है। यही भावना उसे अगला काम करने से रोकती है। इस प्रकार आलस्य आत्मविश्वास की हत्या करता है और व्यक्ति धीरे-धीरे जीवन से विमुख होने लगता है।संत लहरी सिंह कश्यप का मत था कि आलस्य को हराने का एकमात्र उपाय है — ‘कर्म में लग जाना।’ क्योंकि मन का स्वभाव है — वह किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहना चाहता है। यदि उसे उचित दिशा न दी जाए, तो वह निरर्थक चिंतन और आलस्य में फंस जाता है।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से आलस्य

भारतीय दर्शन में भी आलस्य को तमोगुण का लक्षण बताया गया है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था —“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात, कर्म करना मनुष्य का कर्तव्य है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।आलस्य इस श्लोक के विपरीत है, क्योंकि आलसी व्यक्ति कर्म से भागता है और केवल परिणाम की कल्पना करता है।संत लहरी सिंह कश्यप का विचार भी इसी गीता-तत्व से प्रेरित है — कर्म ही पूजा है।

आलस्य से मुक्ति के उपाय

संत लहरी सिंह कश्यप के अनुसार, आलस्य से छुटकारा पाने के लिए कुछ सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं —

  1. नियत समय पर जागना और दिनचर्या बनाना।

  2. हर काम की प्राथमिकता तय करना।

  3. बड़े कार्य को छोटे हिस्सों में बाँटना।

  4. काम को आनंद का साधन बनाना, बोझ नहीं।

  5. सकारात्मक सोच बनाए रखना।

  6. परिणाम से अधिक प्रक्रिया पर ध्यान देना।

  7. अच्छे और कर्मठ लोगों की संगति करना।

इन उपायों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति आलस्य के दलदल से बाहर निकल सकता है।

समाज के लिए सन्देश

आज के समय में जब सुविधा और तकनीक ने जीवन को सरल बना दिया है, तब आलस्य का खतरा और बढ़ गया है। मोबाइल, सोशल मीडिया और आरामदायक साधनों ने मनुष्य को निष्क्रिय बना दिया है। ऐसे समय में संत लहरी सिंह कश्यप का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है —“कर्मठ व्यक्ति सर्वत्र प्रशंसा पाता है, जबकि आलसी अपनी ही दृष्टि में गिर जाता है।” समाज तभी आगे बढ़ेगा जब उसके नागरिक कर्मठ होंगे। आलस्य से घिरे समाज में प्रगति का कोई मार्ग नहीं होता।

उपसंहार

आलस्य वास्तव में मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। यह धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास, ऊर्जा और जीवन उद्देश्य को नष्ट कर देता है।
संत लहरी सिंह कश्यप का यह संदेश केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है —“कर्म ही जीवन का धर्म है, और आलस्य उस धर्म का पतन।”जो व्यक्ति कर्म   को पूजा मानकर जीवन में आगे बढ़ता है, वही सच्चे अर्थों में सफल, सम्मानित और संतुष्ट होता है।
आइए, हम सभी संत लहरी सिंह कश्यप के इस प्रेरक संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करें —
“आलस्य को त्यागें, कर्म को अपनाएँ, और जीवन को अर्थपूर्ण बनाएँ।”

संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों पर आधारित यह निबंध उनके जीवन-दर्शन और समाज सुधार के सिद्धांतों की व्याख्या प्रस्तुत करता है।


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

स्वयं की खोज और संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन दर्शन


 स्वयं की खोज और संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन दर्शन

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन केवल समाज सुधार की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मखोज और मानवता की प्रेरक गाथा है। यह ब्लॉग बताता है कि स्वयं को जानना ही जीवन की सबसे बड़ी खोज है — जो हमें समाज, सेवा और सत्य से जोड़ती है।

 प्रस्तावना: खोज की अनंत यात्रा

हम जन्म से लेकर अंतिम पड़ाव तक की यात्रा में कुछ न कुछ खोजते ही रहते हैं।
यह खोज वैसे ही प्रसुप्त है जैसे बीज में अंकुर छिपा होता है।
कभी धन की खोज में, कभी यश की खोज में, कभी सुख की खोज में हम निरंतर भागते रहते हैं।
आराम से जीने के लिए धन जुटाया, विज्ञान की खोज से सुख-सुविधाओं का संसार बनाया।
नवीनतम चिकित्सा पद्धतियाँ खोज लीं, परंतु स्वास्थ्य में गिरावट फिर भी रुकी नहीं।
और अंत में जब जीवन अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है, तब एक सत्य स्पष्ट होता है —
कि जो कुछ भी हमने खोजा, वह सब यहीं रह गया।

मृत्यु के क्षण में धन, पद, यश — सब निरर्थक प्रतीत होते हैं।
जो साथ नहीं जा सकता, वह सार कैसे हो सकता है?
तभी समझ आता है कि सच्ची खोज बाह्य नहीं, आंतरिक है।
अपने भीतर जो छिपा है — वही वास्तविक, शाश्वत और सार्थक है।

“अपने को जानो, क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, वही जगत को जान लेता है।”

 स्वयं की खोज का अर्थ: बाहर नहीं, भीतर झांको

स्वयं की खोज का अर्थ केवल ध्यान या साधना नहीं,
बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया है।
यह प्रश्न उठाना — “मैं कौन हूँ? मेरा उद्देश्य क्या है?”
यही आत्मज्ञान की शुरुआत है।

यह खोज किसी पुस्तक में नहीं, न किसी मंदिर या पर्वत में;
बल्कि हमारे भीतर होती है।
जैसे ही हम अपने अंतरमन में उतरते हैं,
हम पाते हैं कि जानने के विषय अनगिनत हैं,
पर जानने का कारण एक ही — स्वयं को जानना।

भूल की सबसे बड़ी कीमत — स्वयं को खो देना

हमने बाहरी दुनिया को जीतने में सफलता पाई,
पर स्वयं को भूल गए।
हम हर दिन नई चीजें याद करते हैं — धन, पद, संबंध — पर स्वयं को याद करने का समय नहीं बचा। यह भूल केवल त्रुटि नहीं,  बल्कि स्वयं के प्रति अपराध है।
जहां स्मृति-पटल पर हजारों चीजें अंकित हों,
वहां आत्मस्मरण के लिए स्थान नहीं बचता। मनीषियों ने कहा है —“जो अपने से दूर निकल जाता है, वह अपने आप से अजनबी हो जाता है।” यह अजनबीपन ही जीवन में अंधकार लाता है। इसलिए, हमें भीतर उतरकर अपनी खोज करनी चाहिए — वहीं से प्रकाश का आरंभ होता है।

 स्वयं की खोज का मार्ग — अंतर्मुखता और संकल्प

स्वयं की खोज का एक ही मार्ग है —
सबकी ओर से आंखें मूंदकर स्वयं की ओर देखना।
यह पलायन नहीं, बल्कि पुनरागमन है।मन को इस दृढ़ संकल्प के साथ मोड़ना होगा —“जब तक मैं स्वयं को नहीं जान लेता, तब तक बाकी सब ज्ञान निरर्थक है।” यह संकल्प ही आत्मजागरण की शुरुआत है।
जैसे सूरज के उगते ही अंधकार मिट जाता है,
वैसे ही आत्मबोध का प्रकाश जीवन को प्रकाशित कर देता है।

संत लहरी सिंह कश्यप: आत्मखोज से समाज-खोज तक

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन आत्मखोज की परिणति का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि आत्मज्ञान केवल ध्यान में नहीं, कर्म में प्रकट होता है।वे एक ऐसे संत थे जिन्होंने अपने भीतर के सत्य को समाज के कल्याण से जोड़ा।
उनका संदेश था —“जो स्वयं को जान लेता है, वही समाज को दिशा दे सकता है।”उन्होंने अपनी ऊर्जा शिक्षा, एकता और सेवा में लगाई।
उनकी आत्मखोज केवल अपने लिए नहीं,
बल्कि पूरे समाज के उत्थान के लिए थी।

लहरीपुर की स्थापना — आत्मखोज का सामाजिक रूपांतरण

संत लहरी सिंह कश्यप ने जब लहरीपुर गाँव की स्थापना की,  तो यह केवल एक बस्ती नहीं थी — यह एक जीवंत विचारधारा का प्रतीक थी। उन्होंने ऐसा गाँव बसाया जहाँ शिक्षा, श्रम और समानता जीवन के मूल मूल्य हों।
उनका उद्देश्य था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचान सके। उनका दर्शन स्पष्ट था —“जो स्वयं को जानता है, वही समाज को बदलने की क्षमता रखता है।”

 शिक्षा — आत्मखोज का दीपक

संत लहरी सिंह कश्यप ने शिक्षा को आत्मखोज का माध्यम बताया।
उनके अनुसार शिक्षा केवल अक्षरज्ञान नहीं,
बल्कि आत्मज्ञान का द्वार है। उन्होंने बच्चों को पढ़ने, सोचने और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी।
उनका विश्वास था कि शिक्षा व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है,  और जब व्यक्ति भीतर से प्रकाशित होता है,  तो समाज अपने आप उज्जवल बन जाता है। “जो अपने भीतर की अंधेरी जगहों को नहीं जानता,
वह बाहर का प्रकाश क्या करेगा?”

सेवा — आत्मखोज का कर्मयोग

संत लहरी सिंह कश्यप के लिए सेवा ही सच्ची साधना थी। उनका कहना था —“स्वयं को जानना और दूसरों के लिए जीना — यही आत्मज्ञान की पूर्णता है।” उन्होंने हर व्यक्ति के भीतर मानवता का भाव जगाया।
वे मानते थे कि जब हम समाज की पीड़ा को महसूस करते हैं, तब हम अपने भीतर के ईश्वर को खोजते हैं। उनकी सेवा-यात्रा शिक्षा, संगठन, और मानवीय upliftment के क्षेत्र में दिखाई देती है।

आध्यात्मिकताऔर सामाजिकता का संगम

संत लहरी सिंह कश्यप ने दिखाया कि
आध्यात्मिकता और सामाजिकता अलग नहीं,
बल्कि एक ही चेतना के दो रूप हैं।

उनका धर्म कर्म में था,
उनकी साधना समाज में थी,
और उनकी भक्ति मानवता में।

वे कहते थे —“भक्ति वही सच्ची है जो मनुष्य को मानव बनाती है।”

उनके विचार आज भी हमें सिखाते हैं कि
सच्चा साधक वही है जो समाज की भलाई में अपना सुख खोजता है।

संत लहरी सिंह कश्यप के जीवन संदेश

  1. स्वयं को जानो — यही सभी ज्ञानों का आरंभ है।

  2. शिक्षा का उद्देश्य आत्मज्ञान और समाज सेवा हो।

  3. सेवा ही साधना है — कर्म ही पूजा है।

  4. एकता, समानता और श्रम से समाज का उत्थान संभव है।

  5. जो भीतर से प्रकाशित है, वही बाहर प्रकाश फैला सकता है।

आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज की पीढ़ी तकनीकी रूप से सक्षम है,
लेकिन आध्यात्मिक रूप से भटकी हुई है।
हमने दुनिया को बदलने के साधन खोज लिए हैं,
पर स्वयं को बदलने का साहस नहीं। संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वयं की खोज ही सभी खोजों की जननी है। जब व्यक्ति अपने भीतर उतरता है,
तो उसे अपने कर्मों का अर्थ, जीवन का उद्देश्य,
और समाज में अपनी भूमिका का बोध होता है। निष्कर्ष: स्वयं से समाज तक की यात्रा

स्वयं की खोज केवल ध्यान की प्रक्रिया नहीं —
यह एक जीवंत सामाजिक क्रांति है।
जब व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है,
तो उसके हर कर्म में करुणा, सेवा और प्रकाश झलकता है।संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन इस सत्य का उदाहरण है।  उन्होंने अपने “स्वयं” को खोजकर
उसे समाज के उत्थान में समर्पित किया। “जो अपने भीतर झांकता है, वही बाहर का अंधकार मिटा सकता है।” इसलिए, अपनी यात्रा की शुरुआत भीतर से करें।
जो अपने भीतर के संत को जगाता है,
वह संसार को रोशन कर देता है।

 अंतिम संदेश

स्वयं को भूल जाना सबसे बड़ा अंधकार है।
स्वयं को जान लेना सबसे बड़ा प्रकाश।
संत लहरी सिंह कश्यप की शिक्षाएँ हमें यही बताती हैं कि जीवन तब सार्थक है जब हम स्वयं को पहचानकर
दूसरों के जीवन में रोशनी भरें।

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 (A Journey from the Outer World to the Inner Light) लेखक: AIBCA News Team श्रेणी: आध्यात्मिकता | समाज सुधार | प्रेरणा शब्द संख्या: ~2000 टैग्स: #संतलहरीसिंहकश्यप #स्वयंकीखोज #आत्मबोध #सामाजिकसुधार #AIBCA

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

संत लहरी सिंह और त्याग – समाज के पुनर्निर्माण की प्रेरक गाथा

त्याग वह शब्द है जिसमें सम्पूर्ण मानवता की आत्मा बसती है। त्याग केवल वस्त्र त्यागने या सांसारिक सुखों से दूर रहने का नाम नहीं, बल्कि वह महान भावना है जिसमें मनुष्य अपने स्वार्थों को पीछे छोड़कर दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित हो जाता है। इसी दिव्य भावना का मूर्त रूप थे संत लहरी सिंह कश्यप, जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को समाज सेवा, शिक्षा, समानता और जागृति के लिए अर्पित कर दिया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति का त्याग हजारों जिंदगियों को रोशन कर सकता है।

1. प्रारंभिक जीवन और त्याग की बीजभूमि  

संत लहरी सिंह कश्यप का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था, लेकिन उनके विचार असाधारण थे। बचपन से ही उनमें संवेदनशीलता, करुणा और न्याय की गहरी भावना थी। जब उन्होंने समाज में जातिगत भेदभाव, अशिक्षा और गरीबी की दीवारें देखीं, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना जीवन इन कुरीतियों को मिटाने के लिए समर्पित करेंगे।

2. समाज सेवा के लिए आत्म-बलिदान  

संत लहरी सिंह ने अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग समाज के उत्थान के लिए किया। उन्होंने अपने खेत, धन और समय को शिक्षा और सामाजिक जागृति में लगा दिया। उन्होंने “लहरीपुर” गाँव की स्थापना की — एक ऐसा स्थान जो केवल एक गाँव नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया। यहाँ उन्होंने लोगों को श्रम, समानता और शिक्षा के मूल्य सिखाए।

3. व्यक्तिगत जीवन में त्याग का अनुकरणीय उदाहरण  

संत लहरी सिंह का जीवन अत्यंत सादा था। वे साधारण कपड़े पहनते, सादा भोजन करते और भव्यता से दूर रहते थे। उनका घर हर समय जरूरतमंदों के लिए खुला रहता था। वे कहा करते थे — “जिसने दूसरों के चेहरे पर मुस्कान ला दी, वही सच्चा भक्त और सच्चा इंसान है।”

4. त्याग और नेतृत्व का समन्वय  

त्यागी व्यक्ति केवल त्याग करता ही नहीं, बल्कि वह समाज को एक नई दिशा भी देता है। संत लहरी सिंह में यही गुण था। उन्होंने अशिक्षित समाज को शिक्षित किया, निराश लोगों को आत्मविश्वास दिया और समाज के कमजोर वर्गों को संगठित किया।

5. त्याग से उपजा सामाजिक नवजागरण  

संत लहरी सिंह के त्याग का प्रभाव धीरे-धीरे समाज में एक नवजागरण के रूप में फैल गया। उन्होंने जाति-पाति और ऊँच-नीच की जंजीरों को तोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि जो व्यक्ति समाज के दुख में साझेदार बनता है, वही वास्तविक संत होता है।

6. आध्यात्मिक दृष्टि में त्याग का महत्व  

संत लहरी सिंह का त्याग केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी था। वे कहते थे — “जब तक मनुष्य अपने भीतर के लोभ, अहंकार और क्रोध का त्याग नहीं करता, तब तक वह सच्चा संत नहीं बन सकता।”

7. त्याग की विरासत और आज की आवश्यकता  

आज जब समाज में स्वार्थ, भोगवाद और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे समय में संत लहरी सिंह का जीवन हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। उनकी विरासत केवल लहरीपुर तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन गई।

8. निष्कर्ष – त्याग ही सच्चा वैभव है  

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन एक जीवित संदेश है — “त्याग ही सच्चा वैभव है, सेवा ही सच्ची पूजा है।” उनका त्याग समाज के उत्थान का आधार बना। उन्होंने यह दिखाया कि महानता पद या धन से नहीं, बल्कि त्याग से जन्म लेती है।

👉 संदेश:  

यदि हम अपने भीतर थोड़ा-सा भी संत लहरी सिंह जैसा त्याग और सेवा भाव जागृत कर लें, तो समाज में प्रेम, समानता और करुणा का नया सूर्योदय संभव

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्य तिथि- 12 अक्टूबर 2017

लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्य तिथि- 12 अक्टूबर 2017

        अखिल भारतीय कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट के तत्वावधान में लहरीपुर गाँव बसाने वाले स्व. लहरी सिंह कश्यप जी की चौथी पुण्य तिथि- 12 अक्टूबर 2017 को  प्रातः 11.00 बजे प्रतिज्ञा दिवस दिवस के रूप में  गाँव-लहरीपुर, पोस्ट-टोड्डा, जनपद-शामली (उ.प्र.) में मनाई  गयी।इस अवसर पर  “कश्यप निषाद बिन्द समाज की वर्तमान दशा एवं दिशा” नामक विषय पर संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया सयोज संयोजक मण्डल के रूप में डॉ. जी. सिंह कश्यप अध्यक्ष, आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग, पी.जी. कालेज, गाजीपुर राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन, डॉ. कदम सिंह कश्यप मैनेजिंग डायरेक्टर किसान धन एग्रो फूड तीमारपुर, बिजनौर, डा. रामनिवास कश्यप चिकित्सक झिंझाना, शामली, मा. हरपाल सिंह कश्यप समाजसेवी भमेडी शाहपुर शामली, मा. धर्मवीर सिंह कश्यप पूर्व प्रत्याशी नगर पंचायत, ऊन, शामली   रहे है ,निवेदक के रूप में अखिल भारतीय कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, जनपद इकाई  शामली ने अपना योगदान दिया जिनके संपर्क सूत्र निम्न है 9415973984, 8419846411,9719476109, 9818770900, 9555082550 इस कार्यक्रम में अथिति के  रूप में बहुत ही गणमान्य  समाज सेवी उपस्थित रहे श्री रामकुमार कश्यप, राज्यसभा सांसद, नई दिल्ली,श्री करता राम कश्यप, उपाध्यक्ष-रराष्ट्रीय  कश्यप निषाद मेहरा आदिवासी सभा हरियाणा, श्री किरणपाल सिंह कश्यप, पूर्व मंत्री एवं जिला अध्यक्ष सपा. शामली, श्री गुरचरण सिंह कश्यप, राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय  कश्यप निषाद मल्लाह विकास मंच, नई दिल्ली ,श्री जयन्तीभाई केवट, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कश्यप निषाद मल्लाह विकास मंच, गुजरात,श्री सुखबीर सिंह कश्यप, रा. महासचिव अ.भा. कश्यप निषाद म.वि.मंच, नई दिल्ली,डॉ. हेमन्त कश्यप, शिक्षक अलीगढ़, उ.प्र.,श्री सन्तोष कुमार साहनी, राष्ट्रीय अध्यक्ष समन्वय मोर्चा, दिल्ली,श्री दीपक कश्यप, अध्यक्ष महर्षि कश्यप युवा सेवा समिति, कैराना उ०प्र०, श्री जगदीश कश्यप, महासचिव, महर्षि कश्यप युवा सेवा समिति, कैराना उ०प्र०,श्री अशोक कुमार कश्यप, प्रदेश सचिव, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन, हरियाणा, डॉ. संदीप कुमार, राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन, कुमारी पायल कश्यप, समाजसेवी, थानाभवन, शामली श्री मुकेश कश्यप, समाजसेवी, थानाभवन, शामली,श्री देवानन्द निषाद, प्रदेश महामंत्री, अखिल भारतीय कश्यप  निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, उ.प्र. ,श्री  कवर पाल सिंह कश्यप, समाज सेवा गढ़ी पुख्ता, शामली,श्री नीटू कश्यप, शिक्षक, भनेड़ा, मुजफ्फरनगर, श्री चन्द्रपाल कश्यप, शिक्षक कुडाना, मुजफ्फरनगर श्री विरेन्द्र सिंह कश्यप, समाज सेवा, कुडाना, मुजफ्फरनगर आदि उपस्थित रहे । व्यवस्थापक गण के रूप में भूमिका निभाने वाले श्रीमती रामप्यारी देवी, संरक्षक, अखिल भारतीय  कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, श्री जादोराम कश्यप (नगरी), समाज सेवा भमेडी, शामली, श्री अनुज कुमार कश्यप, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय  कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट,श्री किरण पाल कश्यप, जिलाध्यक्षा,अखिल भारतीय कश्यप निषाद विन्द समाज सेवा ट्रस्ट, शामली, श्री रमेश कश्यप, जिला उपाध्यक्ष, अ.भा. कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, शामली, अंकित कुमार, जिला महामंत्री,अखिल भारतीय कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, शामली, दीपक कुमार कश्यप, कोषाध्यक्ष अखिल भारतीय कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, शामली,मानसिंह कश्यप, समाज सेवी, भमेडी, शामली,मांगेराम कश्यप, समाज सेवी लहरीपुर, शामली,शिव कुमार कश्यप, समाज सेवी, लहरीपुर, शामली,ओमपाल कश्यप, समाज सेवी, लहरीपुर, शामली,श्याम सिंह कश्यप, समाज सेवी, भमेडी, शामली, मास्टर जयप्रकाश, लहरीपुर, शामली, सुरेन्द्र कश्यप, समाज सेवी, लहरीपुर, शामली। मास्टर जीत सिंह कश्यप, भमेडी शामली, सलेक चन्द्र कश्यप, समाज सेवी, लहरीपुर, शामली, विरेन्द्र कश्यप, समाजसेवी, लहरीपुर, शामली,ईश्वर सिंह कश्यप, समाज सेवी, लहरीपुर, शामली,हरपाल सिंह कश्यप, प्रबन्धक, कश्यप सरजीत सिंह जूनियर हाईस्कूल, लहरीपुर,देशपाल कश्यप, समाजसेवी, भमेडी, शामली, मेजपाल कश्यप, समाजसेवी, खानपुर, शामली, चम्पत सिंह कश्यप, समाजसेवी, टोड्डा, शामली,बृजपाल कश्यप, समाजसेवी, रियावली, शामली,श्रीपाल सिंह कश्यप, समाजसेवी, खानपुर, शामली,विक्की कुमार कश्यप, सदस्य, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन,सत्यपाल सिंह कश्यप, सदस्य अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन,डा. सतीश कुमार कश्यप, उपाध्यक्ष, अ.भा. कश्यप, निषाद, बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट, महिपाल सिंह कश्यप, समाजसेवी, गंगारामपुर खेड़की, शामली, राजवीर सिंह गायक, सिन्धु जागरण मंच, लहरीपुर,अशोक कुमार, प्रबन्धक, इलाहाबाद बैंक, जालौन,श्रीमती मांगी देवी, संरक्षक, अ.भा. कश्यप निषांद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट,मांगेराम कश्यप, समाज सेवी, केर्टू शामली,डॉ.रामपाल सिंह कश्यप, समाज सेवी, खेडी खुशनाम, शामली, रतन सिंह कश्यप, समाज सेवी, चौसाना, शामली,पहल सिंह कश्यप, शामली-शामला, शामली।इस कार्यक्रम में गरिमामयी उपस्थिति  के रूप अपना कीमती समय  देने वाले  बी०एल० मेहरा, राष्ट्रीय  प्रचार मंत्री,अखिल भारतीय  कश्यप, निषाद म.वि.मंच, नई दिल्ली,अरविन्द कश्यप, रा. उपा., अ०भा० कश्यप निषाद म. वि. मंच, नई दिल्ली,गुलाब सिंह कश्यप, संस्थापक अ०भा० कश्यप निषाद म. वि. मंच, नई दिल्ली,चौ० सुरेश सिंह कश्यप, नामित सभासद, नगर पंचायत ऊन शामली, नारायण सिंह कश्यप, नामित सभासद, नगर पंचायत झिझाना, शामली,मौहर सिंह कश्यप, पूर्व प्रत्याशी जिला पंचायत, आमवाली, शामली,डा. राकेश कश्यप, चिकित्सक, झिझाना, शामली,बिट्टू कश्यप, समाजसेवी ढिढाली, शामली,मा. नाहर सिंह कश्यप, हरीपुर, शामली, बिरम सिंह कश्यप, समाजसेवी, पूर्व प्रधानाचार्य, ऊन, शामली, रामसिंह कश्यप, शिक्षक, टोड्डा, शामली,करेशन सिंह कश्यप, शिक्षक, शामली शामला, शामली,चन्द्रभान सिंह कश्यप, समाज सेवी, गागौर, शामली,भोपाल सिंह कश्यप, शिक्षक, ढिढाली, शामली,श्याम सिंह कश्यप, शिक्षक नौनागली, शामली, जयपाल सिंह कश्यप, समाजसेवी, गागौर शामली, करताराम कश्यप, समाज सेवी, गागौर, शामली, दिनेश कश्यप, समाजसेवी, टोड्डा, शामली, जगदीश सिंह कश्यप, समाजसेवी, टोड्डा, शामली, शेर सिंह, समाजसेवी, नौजली, शामली, नैन सिंह कश्यप, समाजसेवी, नौजली, शामली,रमेश सिंह कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली, रणवीर सिंह कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली, राजकुमार कश्यप, समाजसेवी, ढिढाली, शामली, बिरमपाल कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली,डा. विजयपाल कश्यप, चिकित्सक, हरीपुर, शामली, धर्मपाल कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली,महेन्द्र कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली, प्रेमसिंह कश्यप, समाजसेवी, बिडौली, शामली,बहन जसवीरी देवी, बिडौली, शामली, जनेश्वर कश्यप, समाजसेवी, पिंडौरा, शामली,बहन आशु कश्यप, जिलाध्यक्ष, महिला मोर्चा कश्यप निषाद युवा मोर्चा, देवीचन्द्र कश्यप, समाजसेवी, ऊन, शामली, राजसिंह कश्यप, समाजसेवी, भमेडी, शामली, कृष्णपाल सिंह कश्यप, संस्थापक, भा०कश्यप जागृति संगठन, सुभाषचन्द कश्यप, ब्लाक अध्यक्ष ऊन, भा० कश्यप जागृति संगठन,जयपाल सिंह कश्यप, लिसाड, सदस्य भा०कश्यप जगूति संगठन,बिजेन्द्र सिंह कश्यप, झिंझाना, सदस्य, भा० कश्यप जागृति संगठन,सत्यपाल सिंह कश्यप, एडवोकेट, भारतीय कश्यप जागृति संगठन,दीपक कुमार कश्यप, झिझाना, सदस्य भारतीय कश्यप जागृति संगठन, सुरेन्द्र कुमार समाजसेवी, गढ़ी हसनपुर, शामली,सतपाल कश्यप, समाजसेवी, असमानपुर, शामली,अमरसिंह कश्यप, समाजसेवी, चौसाना, शामली,धीर सिंह कश्यप, बुच्चा खेड़ी, सदस्य, भा०के०जा०संगठन, रामदिया कश्यप, बधैव, सदस्य भा०क०जा० संगठन,सोहनवीर सिंह कश्यप, सिम्भालका, सदस्य भा०क०जा०संगठन, अम्बरीश कुमार समाजसेवी, नौजली, शामली,मागेराम कश्यप, समाजसेवी, बझेड़ी, शामली, पूरण सिंह कश्यप, संरक्षक, अ०भा० कश्यप निषाद बिन्द समाजसेवा ट्रस्ट उत्तराखण्ड,प्रीतम सिंह कश्यप, सदस्य, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन, उत्तराखण्ड,श्रीपाल सिंह कश्यप, बरसर, राष्ट्रीय किसान महाविद्यालय, शामली,ईशपाल कश्यप, डीलर, मोरमाजरा, शामली, भूरा कश्यप, प्रधान प्रतिनिधि मोरमाजरा, शामली, श्रीपाल कश्यप, समाजसेवी, मोरमाजरा, शामली,इलमचन्द कश्यप नेताजी, ब्राम्हण माजरा, जलालाबाद, पल्टूराम कश्यप, लाइनमैन, थाना भवन, शामली दिनेश कुमार कश्यप, समाज सेवी, गागौर, शामली, धर्मसिंह कश्यप, जंगीरपुर, शामली, अशोक कुमार कश्यप, अध्यक्ष महर्षि कश्यप शिक्षा समिति, लपराना,प्रवीण कश्यप, समाज सेवा, हडौली, शामली,रामशरण कश्यप, समाज सेवा, भैंसवाल, शामली, रामशरण कश्यप, प्रधान बिडौली, शामली,अजय कुमार कश्यप, कैशियर गागौर, शामली,चौधरी भोपाल सिंह कश्यप, भैंसवाल, शामली,डा. रामलाल कश्यप, नेता बसपा, लिलौन, शामली,मुकेश कश्यप, समाज सेवा, लिलौन, शामली

लहरीपुर गाँव और लहरी सिंह कश्यप 

     गाँव लहरीपुर जनपद शामली के कस्बा ऊन से, ऊन चौसाना मार्ग पर, ऊन से दो किमी० दूर चौराहा से बाँयी ओर स्थित है। इस गाँव को स्व. लहरी सिंह कश्यप ने लगभग 1968 में बसाया था। लहरी सिंह कश्यप का जन्म सन् 1938 में ऊन में हुआ था, इनके पिताजी का नाम श्री छित्तर सिंह कश्यप, माता का नाम श्रीमती बकतावरी देवी एवं पत्नी का नाम श्रीमती रामप्यारी देवी है। ये सात भाई बहन थे। इनके बड़े भाई का नाम श्री कलिराम सिंह कश्यप एवं बृहम सिंह कश्यप जिनका देहान्त हो चुका है। छोटे भाई श्री पूरण सिंह कश्यप एवं श्री ओमपाल सिंह कश्यप जीवित हैं। इनकी बहन का नाम स्व. बुगली देवी एवं श्रीमती लहरो देवी है। लहरी सिंह कश्यप के चार पुत्र एवं दो पुत्रियाँ हैं। स्वभाव से मृदु, स्वाभिमानी, ईमानदार एवं परिश्रमी, सामाजिक क्रान्तिकारी, अन्धविश्वास के घोर विरोधी श्री लहरी सिंह कश्यप का देहान्त 12 अक्टूबर 2013 को गाँव लहरीपुर में हुआ था।

     स्व. लहरी सिंह कश्यप ने कश्यप निषाद वंशीय समाज में सामाजिक एकता स्थापित करने के लिये एवं शासन-प्रशासन में उचित भागीदारी दिलवाने हेतु देश के सभी राज्यों का भ्रमण किया और पाया कि कश्यप निषाद वंशीय समाज विभिन्न जातियों एवं उपजातियों में बटा हुआ है जो धींवर, झींवर, झींमर, घींमर, ढींवर, ढींमर, डेवर माँझी, मझवार, केवट, बिन्द, खरबिन्द, बेलदार, बिन्टा, कहार, कश्यप, गोड़िया, बाथम, बथुवा तुरैहा, मल्लाह, भोइ, खरवार, चाई, मुड़ियार, सरैया, तीयर, सोधिया, रैकवार, साहनी, बरमैया, सिंघाडिया, सिगराहा, बहेलिया, बर्मन, धुरिया, कमकर आदि 140 से भी अधिक नामों से सम्पूर्ण भारत में पहचाने जाने वाला एक ही समाज है। इस समाज में महाराजा गुहराज निषादराज, महाराजा हिरण्यकश्यप, महाराजा हिरण्यधनु, धनुर्धर वीर एकलव्य आदि महापुरूषों ने जन्म लिया है जिन पर इस समाज को गर्व करना चाहिए। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले तिलका माझी एवं सिद्धोमाझी भी इसी समाज के वीर सपूत हैं। परन्तु यह समाज अशिक्षा, अज्ञानता, अन्याय एवं अभाव का शिकार बना हुआ है, जिसका शासन-प्रशासन में प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है।

            लहरी सिंह कश्यप ने इस समाज को सामाजिक न्याय दिलवाने हेतु जीवन भर संघर्ष किया है। उनका कहना था कि शिक्षा के अभाव में यह समाज तरक्की नहीं कर पाया है, धूर्त एवं चालाक लोगों ने इस समाज को शिक्षा से वंचित रखने का कार्य किया है। उनका यह भी कहना था कि एक वक्त का खाना छोड़कर बच्चों को शिक्षित करो, जमीन गिरवी रखकर या वेचकर, घर की महिलाओं के गहने गिरवी रखकर या बेचकर बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध करो, बुद्धिमान बनो, न्यायशील रहों एवं अच्छी संगति  रखो। यह सत्य है कि गरीबी से दुख पैदा होता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि गरीबी दूर होने से आदमी सुखी भी हो जाये। ऊँचा जीवन स्तर नही, बल्कि ऊँचा आचरण सुख का मूल मंत्र है। यह पुरानी बात है जो चुप रहता है उसकी भी निन्दा होती है, जो अधिक बोलता है उसकी भी निन्दा होती है और जो कम बोलता है उसकी भी निन्दा होती है, इस पृथ्वी पर कोई ऐसा व्यक्ति नही है जिसकी कोई न कोई निन्दा न करता हो। ना कोई ऐसा आदमी हुआ है, न होगा और न है, जिसकी निरन्तर निन्दा ही निन्दा होती हो अथवा निरन्तर प्रशंशा होती हो। अपने आप पर विश्वास करो, आत्म नियत्रंण रखो, निन्दा से डरो नही सत्कर्म करो, नशे से दूर रहो।

          अतः अखिल भारतीय कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट ने ऐसे महान व्यक्ति के विचारों को जनता तक पहुँचाने की दृष्टि से उनकी पुण्य तिथि 12 अक्टूबर 2017 को प्रतिज्ञा दिवस के रूप में मनाने का संकल्प लिया है। अतः कश्यप निषाद वंशीय समाज के सभी युवा, विद्यार्थी, माताओं, बहनो, बुजुर्गों से अपील है कि समय से पधार कर सन्मार्ग पर चलने का संकल्प लें।