शनिवार, 27 सितंबर 2025

सामाजिक समन्वय और जगत कल्याण हेतु शिक्षा की आवश्यकता : संत लहरी सिंह कश्यप के विचारों के आलोक में एक विस्तृत अध्ययन : डॉ०सतीश कुमार



सारांश (Abstract)

भारतीय समाज की बहुलतावादी संरचना उसकी सबसे बड़ी विशेषता भी है और चुनौती भी। विविधता में समरसता तभी संभव है जब शिक्षा व्यक्ति और समाज दोनों को समानता, न्याय और मानवता के मूल्यों से संपन्न बनाए। शिक्षा का अर्थ केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन-दर्शन, सामाजिक समरसता और वैश्विक कल्याण का आधार है।

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन इसी दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक न्याय, समता और मानव कल्याण का साधन माना। यह शोध-पत्र शिक्षा के ऐतिहासिक व दार्शनिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समन्वय में शिक्षा की भूमिका, जगत कल्याण में इसकी आवश्यकता, वर्तमान भारतीय समाज की चुनौतियों तथा संत लहरी सिंह कश्यप के योगदान पर केंद्रित है। अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि शिक्षा ही सामाजिक समन्वय और जगत कल्याण की सर्वाधिक प्रभावी कुंजी है।

प्रमुख शब्द (Keywords)

शिक्षा, सामाजिक समन्वय, जगत कल्याण, संत लहरी सिंह कश्यप, समानता, सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्य, सतत विकास

1. प्रस्तावना (Introduction)

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। यहाँ की सामाजिक संरचना विविधताओं से भरी है। जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता – ये सब मिलकर भारत की आत्मा को बनाते हैं। परंतु विविधताओं में एकता तभी संभव है जब व्यक्ति और समाज दोनों शिक्षा से आलोकित हों।

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और समन्वय की सबसे बड़ी धुरी है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब तक वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक न तो सामाजिक समानता स्थापित होगी और न ही राष्ट्र प्रगति कर सकेगा।

12 अक्टूबर 2025 को उनके 12वें स्मृति दिवस पर आयोजित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी “सामाजिक समन्वय और जगत कल्याण हेतु शिक्षा की आवश्यकता” विषय पर विचार करने का अद्वितीय अवसर है।

2. शिक्षा का दार्शनिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

2.1 भारतीय परंपरा में शिक्षा

प्राचीन भारतीय शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल विद्या-अर्जन नहीं था। वेद, उपनिषद और पुराणों में शिक्षा का लक्ष्य आत्मज्ञान, चरित्र-निर्माण और लोक-कल्याण बताया गया है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि संस्कृति और वैश्विक विचार-विनिमय के केंद्र थे।

2.2 मध्यकालीन परिदृश्य

मध्यकाल में शिक्षा का स्वरूप सीमित हुआ। जातिगत संरचनाओं और पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने शिक्षा को चुनिंदा वर्गों तक सीमित कर दिया। परिणामस्वरूप समाज का बड़ा हिस्सा अंधकार और अज्ञान में डूबा रहा।

2.3 औपनिवेशिक काल की शिक्षा

ब्रिटिश शासन ने शिक्षा को प्रशासनिक जरूरतों तक सीमित कर दिया। परंतु इसी दौर में फुले, सावित्रीबाई, और बाद में डॉ. आंबेडकर जैसे सुधारकों ने शिक्षा को मुक्ति का हथियार बनाया।

2.4 आधुनिक दार्शनिक दृष्टिकोण

आधुनिक काल में शिक्षा का लक्ष्य बहुआयामी विकास है – बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक। आज यह केवल व्यक्ति की उन्नति का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र और विश्व की उन्नति का आधार है।

3. सामाजिक समन्वय में शिक्षा की भूमिका

3.1 जातिगत समन्वय

भारत में जातिगत भेदभाव सामाजिक समानता की सबसे बड़ी बाधा रहा है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो जाति-पांति की दीवारों को तोड़कर सभी को समान अवसर देती है।

3.2 धार्मिक सहिष्णुता

शिक्षा विभिन्न धर्मों की समानताओं और सार्वभौमिक मूल्यों को समझाती है। यह सांप्रदायिकता और कट्टरता को समाप्त करने का साधन है।

3.3 लैंगिक समानता

पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा गया। शिक्षा ने ही इस असमानता को चुनौती दी और स्त्री-पुरुष समानता की नींव रखी।

3.4 नैतिक मूल्य और नागरिकता

शिक्षा सहयोग, करुणा, सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को विकसित करती है। यही मूल्य सामाजिक समन्वय के लिए आवश्यक हैं।

4. जगत कल्याण हेतु शिक्षा का महत्व

4.1 मानवता का विकास

शिक्षा व्यक्ति को यह सिखाती है कि उसका कर्तव्य केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता की सेवा करना है।

4.2 पर्यावरणीय चेतना

आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट पूरे विश्व के सामने है। शिक्षा ही वह साधन है जो सतत विकास, ऊर्जा संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित कर सकती है।

4.3 वैश्विक शांति

युद्ध, हिंसा और आतंकवाद का समाधान केवल शिक्षा से ही संभव है। शिक्षा संवाद और सहिष्णुता का मार्ग दिखाती है।

4.4 विज्ञान और नैतिकता

प्रौद्योगिकी की प्रगति तभी सार्थक है जब उसका उपयोग मानवता की सेवा में हो। शिक्षा ही विज्ञान और नैतिकता का संतुलन स्थापित कर सकती है।

5. वर्तमान भारतीय समाज की चुनौतियाँ

  1. अशिक्षा और निरक्षरता: अभी भी ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर कमजोर है।

  2. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव: शिक्षा का प्रसार हुआ है, पर गुणवत्ता में विषमता है।

  3. जातिवाद और भेदभाव: वंचित तबकों तक शिक्षा पहुँचाने में सामाजिक भेदभाव बड़ी बाधा है।

  4. आर्थिक विषमता: गरीब वर्ग शिक्षा की ऊँची लागत वहन नहीं कर पाता।

  5. बेरोज़गारी और कौशल संकट: शिक्षा व्यवस्था प्रायः रोजगारोन्मुख नहीं है।

  6. सांप्रदायिकता: शिक्षा में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की कमी से समाज में विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ती है।

6. संत लहरी सिंह कश्यप के विचार और योगदान

  • समता का दर्शन: उन्होंने कहा कि शिक्षा समान अवसर और सामाजिक न्याय की कुंजी है।

  • वंचितों की शिक्षा: उन्होंने कमजोर वर्गों तक शिक्षा पहुँचाने पर बल दिया।

  • सामाजिक सुधार: उन्होंने शिक्षा को अंधविश्वास, जातिवाद और भेदभाव मिटाने का हथियार माना।

  • मानवता और भाईचारा: उनका संदेश था – शिक्षा का उद्देश्य मानवता और सहयोग की भावना जगाना है।

उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि शिक्षा को यदि हम केवल डिग्री तक सीमित करेंगे तो उसका वास्तविक उद्देश्य खो जाएगा।

7. चर्चा (Discussion)

वर्तमान युग में शिक्षा केवल तकनीकी विकास का साधन नहीं हो सकती। यदि शिक्षा सामाजिक और नैतिक मूल्यों से रहित होगी तो वह विभाजन और शोषण को और बढ़ाएगी। इसलिए शिक्षा को मूल्यपरक और समावेशी बनाना अनिवार्य है।

संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि शिक्षा का असली लक्ष्य “एक व्यक्ति – एक मूल्य” की स्थापना है। शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुँचे।

8. भविष्य की दिशा (Future Prospects)

  1. समावेशी शिक्षा नीति: सभी वर्गों को समान अवसर दिया जाए।

  2. ग्रामीण शिक्षा पर बल: गाँवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था हो।

  3. मूल्य आधारित शिक्षा: करुणा, सहिष्णुता और सेवा की भावना विकसित की जाए।

  4. रोज़गार उन्मुख शिक्षा: शिक्षा को कौशल विकास और आत्मनिर्भरता से जोड़ा जाए।

  5. प्रौद्योगिकी का उपयोग: डिजिटल शिक्षा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया जाए।

  6. अनुसंधान और नवाचार: शिक्षा को रचनात्मक और शोधपरक बनाया जाए।

9. निष्कर्ष (Conclusion)

शिक्षा ही वह शक्ति है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर समाज में समानता, भाईचारा और समन्वय स्थापित करती है। शिक्षा ही वह साधन है जो जगत कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवता की स्थापना है। उनके विचारों के आलोक में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा समावेशी, मूल्यपरक और कल्याणकारी बने।

10. संदर्भ सूची (References)

  1. आंबेडकर, भीमराव. शिक्षा और सामाजिक न्याय पर विचार.

  2. फुले, ज्योतिराव. गुलामगिरी.

  3. गांधी, मोहनदास. हिन्द स्वराज.

  4. शर्मा, आर.एन. (2020). भारतीय शिक्षा का इतिहास और दर्शन.

  5. कश्यप, लहरी सिंह. समता और शिक्षा संबंधी प्रवचन. (संपादित संकलन, 2010).

  6. शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार. नई शिक्षा नीति 2020.

  7. मिश्रा, के.के. (2022). भारतीय समाज और शिक्षा.

  8. ओझा, एस. (2019). सामाजिक न्याय और शिक्षा का परिप्रेक्ष्य.



बुधवार, 24 सितंबर 2025

लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी के 12 वें स्मृति दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी लहरीपुर शामली में

🌺लहरीपुर गाँव बसाने वाले  संत लहरी सिंह कश्यप जी के 12 वें स्मृति दिवस पर  🌺
 राष्ट्रीय  संगोष्ठी
 विषय:-“सामाजिक समन्वय और जगत कल्याण हेतु शिक्षा की आवश्यकता”

परिचय
संत लहरी सिंह कश्यप जी ने अपने जीवनकाल में समाज को अंधविश्वास, पाखंड और भेदभाव से मुक्त करने का अभियान चलाया। उन्होंने सदैव शिक्षा को ही वह साधन माना, जिसके माध्यम से समाज में समानता, जागरूकता बन्धुता लाई जा सकती है।
     शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का आधार है। शिक्षा ही व्यक्ति में विवेक, नैतिकता और सहयोग की भावना जागृत करती है। जब समाज का हर वर्ग शिक्षा से सशक्त होता है, तब समन्वय और एकता का वातावरण निर्मित होता है।
      सामाजिक समन्वय का अर्थ है—विविधता में एकता, भिन्न-भिन्न वर्गों और समुदायों का एक-दूसरे के साथ सम्मान और सहयोग के साथ जुड़ना। शिक्षा इस समन्वय का सेतु है, जो जाति, वर्ग और लिंग के भेद को मिटाकर एक समरस समाज की नींव रखती है।
जगत कल्याण की संकल्पना भी शिक्षा के बिना अधूरी है। शिक्षा मानव को न केवल स्वयं के लिए, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण हेतु कर्तव्यनिष्ठ बनाती है। यह हमें पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय संवेदनाओं का महत्व सिखाती है।
संत लहरी सिंह कश्यप जी का जीवन संदेश है कि शिक्षा को केवल रोजगार का साधन न मानकर, इसे सामाजिक परिवर्तन, समन्वय और विश्व कल्याण का माध्यम बनाया जाए। यही उनके विचारों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 स्थान :  संत लहरी सिंह धाम आश्रम लहरीपुर, जनपद-शामली,उत्तर प्रदेश 
 दिनांक : 12 अक्टूबर 2025
  समय : प्रातः 11.00 बजे
 आप सभी से सादर निवेदनहै कि संगोष्ठी  में सहभागी बनकर इस विचारयात्रा को सार्थक बनाएं। धन्यवाद।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

संत लहरी सिंह कश्यप द्वारा चलाये गए अंधविश्वास, पाखंड एवं कुरीतियों निवारण कार्य

संत लहरी सिंह कश्यप द्वारा चलाये गए अंधविश्वास, पाखंड एवं कुरीतियों निवारण कार्य

 समाज में प्रगति और जागरूकता तभी संभव है जब लोग तर्क और विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाएं। भारत के सामाजिक परिदृश्य में कई ऐसे संत और समाज सुधारक हुए जिन्होंने अंधविश्वास, पाखंड और कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की। इन्हीं में से एक अग्रणी व्यक्तित्व थे संत लहरी सिंह कश्यप, जिन्होंने समाज को अज्ञानता और रूढ़ियों की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल अंधविश्वासों का विरोध किया, बल्कि समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच अपनाने का संदेश दिया।

1. अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ अभियान

संत लहरी सिंह कश्यप ने अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य समाज को अंधविश्वासों से मुक्त करना बनाया। गाँव-गाँव जाकर उन्होंने लोगों को समझाया कि कोई देवी-देवता या चमत्कार हमारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते, बल्कि मेहनत, शिक्षा और आपसी सहयोग ही वास्तविक समाधान हैं। उन्होंने टोने-टोटकों, झाड़-फूंक और चमत्कारों की आड़ में लोगों को ठगने वाले पाखंडियों का विरोध किया और जनता को जागरूक किया कि इनसे बचना ही समझदारी है।

2. कुरीतियों के निवारण में योगदान

संत कश्यप ने समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे जातिगत भेदभाव, छुआछूत, बाल विवाह और महिला असमानता के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। वे मानते थे कि जब तक समाज इन बुराइयों से मुक्त नहीं होगा, तब तक समानता और न्याय की स्थापना असंभव है। उन्होंने हमेशा कहा कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी जाति या जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से तय होना चाहिए। उनके प्रयासों से कई क्षेत्रों में लोगों ने इन कुरीतियों को छोड़कर सामाजिक सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया।

3. शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बल

संत लहरी सिंह कश्यप का मानना था कि शिक्षा ही वह साधन है जो समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा सकती है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा दें और विज्ञान आधारित सोच विकसित करें। वे हर सभा और प्रवचन में यही संदेश देते कि तर्क और विज्ञान ही जीवन का वास्तविक मार्गदर्शक है। उनका यह दृष्टिकोण समाज को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ और अनेक युवाओं ने शिक्षा और जागरूकता की राह चुनी।

निष्कर्ष

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन हमें यह सिखाता है कि अंधविश्वास, पाखंड और कुरीतियाँ समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। उन्होंने जो संघर्ष किया, वह आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक युग में भी जब समाज अंधविश्वास और कट्टरता से जूझ रहा है, तब संत कश्यप के विचार और कार्य हमें प्रेरित करते हैं कि हम तर्क, शिक्षा और समानता को अपनाकर समाज को सही दिशा में ले जाएँ। उनका जीवन एक आदर्श है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन करता रहेगा।


बुधवार, 17 सितंबर 2025

संत लहरी सिंह कश्यप जी का जीवन परिचय

 
संत लहरी सिंह कश्यप एक ऐसे महान समाजसेवी और संत थे जिन्होंने अपने जीवन को पिछड़े वर्गों के उत्थान, सामाजिक न्याय और शिक्षा के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। वे उत्तर प्रदेश के शामली जिले में लहरीपुर गाँव के संस्थापक थे और उनके कार्यों ने हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। उनका जीवन दर्शन शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर आधारित था, जो दबे-कुचले समाज को मजबूत बनाने का मूल मंत्र था। इस जीवन परिचय में हम उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा, उनके योगदान, दर्शन और विरासत पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिसमें उपलब्ध स्रोतों से प्राप्त जानकारी को शामिल किया गया है। यह परिचय उपलब्द जानकारी के आधार पर सरल  शब्दों में लिखा गया है, जिसमें उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को कवर किया गया है, हालांकि उपलब्ध जानकारी सीमित होने के कारण कुछ भागों में सामाजिक संदर्भ और उनके कार्यों के प्रभाव को विस्तार से समझाया गया है।
1.प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
           संत लहरी सिंह कश्यप का जन्म 7 जुलाई 1938 को हुआ था। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, जहाँ उनके पिता का नाम श्री छित्तर सिंह कश्यप और माता का नाम बकतावरी देवी था। उनके परिवार में सात भाई-बहन थे, जिनमें बड़े भाई कलीराम सिंह कश्यप और ब्रह्म सिंह कश्यप (जिनका देहांत हो चुका है), छोटे भाई पूरण सिंह कश्यप और ओमपाल सिंह कश्यप (इनका भी निधन हो चुका है), तथा बहनें बुगली देवी (स्वर्गीय) और लहरो देवी शामिल थे। उनकी पत्नी का नाम रामप्यारी देवी था और उनके चार पुत्र तथा दो पुत्रियाँ है सबसे बड़े पुत्र डॉ०जी सिंह कश्यप पी जी कॉलेज गाजीपुर में आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष है वे विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए जैसे अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष,राष्ट्रीय सामाजिक न्याय चेतना ट्रस्ट के संस्थापक, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग पब्लिकेशन ट्रस्ट के संस्थापक और महासचिव है लगभग 10 वर्षो तक बामसेफ के गाजीपुर जिले के अध्यक्ष रहे है,तथा अर्जक संघ के भी समर्थक है,डॉ० जी० सिंह कश्यप की पत्नी सुनीता देवी  सुशिक्षित एवं सफल गृहणी है,  दूसरे पुत्र किरणपाल सिंह कश्यप गाँव लहरीपुर मे संत लहरी सिंह  धाम आश्रम के संचालक है  किरणपाल सिंह की पत्नी बृजेश देवी समाज सेविका है ,तीसरे पुत्र डॉ० सतीश कुमार कश्यप  समाजशास्त्र विषय मे डॉक्टरेट किये हुए है और नेचर बायो फ़ूड कंपनी में काम करते है इनकी पत्नी श्रीमती वन्दना एम०ए० बी०एड० है,चौथे पुत्र डॉ० सत्यपाल सिंह कश्यप नोएडा स्थित आई आई एम टी  कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है वे इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में बी०टेक० एम०टेक०  है और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी से डॉक्टरेट है इनकी पत्नी श्रीमती अंजू देवी शिक्षिका है।    
    यह जानकारी उनके स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों और वीडियो दस्तावेजों से प्राप्त हुई है, जो उनके जीवन को एक साधारण किसान परिवार से जोड़ती है। उनका प्रारंभिक जीवन उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बीता, जहाँ उस समय पिछड़े वर्गों में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी थी। लहरी सिंह कश्यप ने केवल मिडिल तक की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता और सामाजिक चेतना बचपन से ही स्पष्ट थी। उस समय भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दौर में था, जहाँ सामाजिक असमानता, जातिवाद और आर्थिक पिछड़ापन प्रमुख मुद्दे थे। कश्यप समाज, जो धीवर, झींवर, ढींवर, मांझी, केवट, बिंद, कहार आदि लगभग  140 से अधिक नामों से जाना जाता है, अति पिछड़े वर्गों में आता था। इस समाज में महाराजा गुहराज, निषादराज, हिरण्यकश्यप, हिरण्यधनु और एकलव्य जैसे ऐतिहासिक महापुरुष जन्मे थे, लेकिन आधुनिक काल में यह समाज शिक्षा और अधिकारों से वंचित था।
        लहरी सिंह कश्यप के बचपन में परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। उनके पिता छित्तर सिंह कश्यप एक किसान थे, और परिवार कृषि पर निर्भर था। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें जल्दी ही समाज की असमानताओं से परिचित करा दिया। वे देखते थे कि कैसे पिछड़े वर्गों को शासन-प्रशासन में उचित भागीदारी नहीं मिलती, और अशिक्षा, अज्ञानता तथा सामाजिक दब्बूपन उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। इसने उनके मन में सामाजिक न्याय की भावना को जन्म दिया। युवावस्था में वे पाखंडवाद, अंधविश्वास और बेकार के रीतिरिवाजों के खिलाफ खड़े होने लगे। उन्होंने शिक्षा को उन्नति का मूल मंत्र माना और लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित करना शुरू किया।
         उनकी शादी रामप्यारी देवी से हुई, जो उनके जीवन की साथी बनीं। परिवार में चार पुत्र और दो पुत्रियाँ होने से उनका दायित्व बढ़ा, लेकिन उन्होंने कभी व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक कार्यों से ऊपर नहीं रखा। उनके एक सबसे बड़े पुत्र डॉ. जी. सिंह कश्यप, जो जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के प्रोफेसर हैं, उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और सोशल मीडिया पर उनके स्मृति दिवसों की जानकारी साझा करते हैं।
   लहरी सिंह कश्यप का प्रारंभिक जीवन एक संघर्षपूर्ण यात्रा थी, जहाँ उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज के उत्थान की नींव रखी। उनका मानना था कि "शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही समाज बदलने का रास्ता है। यह दर्शन उनके बचपन की अनुभवों से निकला, जहाँ उन्होंने देखा कि कैसे जातिवाद और आर्थिक असमानता लोगों को दबाए रखती है।
       उनके जीवन के इस चरण में, 1950-60 के दशक में भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन चल रहे थे। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर वे पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए जागरूक हुए। उनकी शिक्षा भले ही औपचारिक रूप से सीमित थी, लेकिन आत्म-शिक्षा ने उन्हें एक विचारक बना दिया। वे ग्रामीण क्षेत्रों में घूमकर लोगों से बात करते, उनकी समस्याएँ सुनते और समाधान सुझाते। यह अवधि उनके जीवन की आधारशिला बनी, जहाँ उन्होंने महसूस किया कि पिछड़े समाज को एकजुट करने की आवश्यकता है। कश्यप समाज की विभिन्न उपजातियों को एक मंच पर लाने का प्रयास उन्होंने इसी समय शुरू किया। उनका परिवार उनके इस मिशन में सहयोगी रहा, और रामप्यारी देवी ने घर संभालकर उन्हें सामाजिक कार्यों के लिए स्वतंत्र किया।
       इस प्रारंभिक जीवन ने उन्हें एक संत की तरह बनाया, जहाँ व्यक्तिगत सुख से ऊपर सामाजिक न्याय को रखा गया। उनके जीवन की यह नींव आगे के योगदानों के लिए मजबूत आधार बनी, और उन्होंने सिद्ध किया कि साधारण पृष्ठभूमि से भी असाधारण कार्य किए जा सकते हैं।
2.लहरीपुर गाँव की स्थापना 
     संत लहरी सिंह कश्यप के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लहरीपुर गाँव की स्थापना है, जिसे उन्होंने 1968 में बसाया। यह गाँव उत्तर प्रदेश के शामली जिले में ऊन कस्बे से ऊन-चौसाना मार्ग पर लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित है। लहरीपुर का नाम उनके नाम पर रखा गया, जो उनके संघर्ष और दृष्टि का प्रतीक है। उस समय ग्रामीण भारत में पिछड़े वर्गों के लिए अलग बसावट की कमी थी, और वे मुख्यधारा से कटे हुए थे। लहरी सिंह कश्यप ने महसूस किया कि समाज की उन्नति के लिए एक स्वतंत्र और संगठित स्थान की आवश्यकता है, जहाँ शिक्षा और एकता पर जोर दिया जा सके।
       1960 के दशक में भारत में भूमि सुधार और ग्रामीण विकास के प्रयास चल रहे थे, लेकिन पिछड़े वर्गों को इसका लाभ कम मिलता था। लहरी सिंह कश्यप ने देश भर में भ्रमण कर पिछड़े समाज की स्थिति का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि कश्यप समाज विभिन्न नामों से बिखरा हुआ है और सामाजिक न्याय से वंचित है। इसी क्रम में उन्होंने लहरीपुर की स्थापना का निर्णय लिया। यह गाँव न केवल एक बसावट था, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग था, जहाँ दबे-कुचले लोग एकजुट होकर रह सकें। गाँव की स्थापना में उन्होंने स्थानीय लोगों को शामिल किया और कृषि, शिक्षा तथा सामुदायिक विकास पर फोकस किया।
      लहरीपुर की स्थापना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। उस समय भूमि अधिग्रहण और बसावट के लिए प्रशासनिक बाधाएँ थीं, लेकिन लहरी सिंह कश्यप के नेतृत्व में लोगों ने मिलकर इसे संभव बनाया। गाँव में स्कूल, सामुदायिक केंद्र और कृषि सुविधाएँ विकसित की गईं। उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी और गाँव के बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह गाँव कश्यप समाज के लिए एक मॉडल बना, जहाँ महिलाओं, बच्चों, किसानों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की जाती थी।
       उनके दर्शन के अनुसार, "मनुष्य का मूल्य उसकी जाति नहीं, उसके कर्म और चरित्र से है," जिसने गाँव में जातिवाद को कम करने में मदद की।  गाँव की स्थापना के बाद, लहरी सिंह कश्यप ने इसे सामाजिक न्याय का केंद्र बनाया। वे देश के विभिन्न राज्यों में घूमकर लोगों को लहरीपुर के मॉडल से अवगत कराते। यहाँ पर अति पिछड़े समाज को एकजुट करने के कार्यक्रम आयोजित होते। गाँव में शिक्षा के लिए प्रयास किए गए, और कई लोग उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में पहुँचे। लहरीपुर आज भी उनके योगदान का जीवंत उदाहरण है, जहाँ हर साल उनके स्मृति दिवस पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
       इस स्थापना ने उनके जीवन को नई दिशा दी। यह न केवल एक भौगोलिक स्थान था, बल्कि उनके संघर्ष का फल था। लहरीपुर ने साबित किया कि संगठन से सामाजिक बदलाव संभव है, और यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
3.सामाजिक कार्य और योगदान 
       संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन सामाजिक कार्यों से भरा पड़ा था। उन्होंने अति पिछड़े समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। उनका मुख्य फोकस अशिक्षा, अज्ञानता, मलिनता और सामाजिक दब्बूपन को दूर करना था। वे पाखंडवाद, अंधविश्वास और बेकार के रीतिरिवाजों के घोर विरोधी थे। उन्होंने शिक्षा को उन्नति का मार्ग बताया और लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया। उनके कार्यों ने  दबे कुचले एवं कश्यप समाज और अन्य पिछड़े वर्गों को एक नई पहचान दी।
         उनके सामाजिक कार्यों की शुरुआत युवावस्था से हुई, जब उन्होंने देखा कि पिछड़े वर्ग शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी से वंचित हैं। उन्होंने देश के सभी राज्यों में भ्रमण किया और जनजागरण अभियान चलाया। यह अभियान अति पिछड़े जातियों के लिए था, जहाँ उन्होंने विभिन्न उपजातियों को एकजुट करने का प्रयास किया।  अकेले कश्यप समाज की लगभग  140 से अधिक उपजातियाँ जैसे धीवर, झींवर, मांझी, केवट आदि को उन्होंने एक मंच पर लाया। उनके अभियान ने लोगों में जागरूकता फैलाई और उन्हें अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित किया।
        लहरी सिंह कश्यप महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के रक्षक थे। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कार्य किया, जहाँ शिक्षा और समानता पर जोर दिया। किसानों और मजदूरों के लिए वे सच्चे साथी थे, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उनका संदेश था कि "दबे-कुचले समाज की आवाज बनो," जो उनके कार्यों में झलकता है। उन्होंने मानवता, न्याय और समानता के लिए जीवन समर्पित किया। उनके योगदान में लहरीपुर गाँव की स्थापना प्रमुख है, लेकिन इससे आगे उन्होंने शिक्षा संस्थानों की स्थापना में योगदान दिया। गाँव में स्कूल और कॉलेज स्थापित करने में उनकी भूमिका थी, जिससे हजारों छात्र लाभान्वित हुए। उन्होंने बौद्ध और अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर समाज को संगठित किया। उनके कार्यों ने पिछड़े वर्गों में उच्च शिक्षा और नौकरियों को बढ़ावा दिया।
      उनके जीवन दर्शन पर आधारित कार्यक्रमों में संविधान की शपथ, सरवधर्म प्रार्थना और वैचारिक संगोष्ठियाँ शामिल होती हैं। उनके स्मृति दिवस पर आयोजित घटनाएँ उनके योगदान को याद करती हैं। उदाहरण के लिए, 2022 में नौवें स्मृति दिवस पर झंडारोहण, राष्ट्रगान और सामाजिक उत्थान पर चर्चा हुई। 2023 में दसवें स्मृति दिवस पर प्रेरणा शक्ति ज्योति यात्रा निकाली गई। 2024 में 11वें स्मृति दिवस पर धूमधाम से मनाया गया।  उनके कार्यों का प्रभाव आज भी दिखता है। कश्यप समाज में उनकी वजह से जागरूकता आई, और कई लोग राजनीति और शिक्षा में आगे बढ़े। उन्होंने सिद्ध किया कि साधारण व्यक्ति भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
4.दर्शन और विचारधारा 
       संत लहरी सिंह कश्यप का दर्शन शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर आधारित था। उन्होंने कहा, "शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही समाज बदलने का रास्ता है। वे मानते थे कि मनुष्य का मूल्य जाति से नहीं, कर्म और चरित्र से है। उनका दर्शन अंबेडकर और बुद्ध से प्रेरित था, जहाँ सामाजिक न्याय प्रमुख था। वे अंधविश्वास के खिलाफ थे और शिक्षा को मुक्ति का साधन मानते थे। उनके विचारों ने पिछड़े समाज को एकजुट किया।
मृत्यु और विरासत
      संत लहरी सिंह कश्यप का निधन 12 अक्टूबर 2013 को हुआ। उनकी मृत्यु के बाद हर साल स्मृति दिवस मनाया जाता है। उनकी विरासत शिक्षा और न्याय में जीवित है। उनके पुत्र डॉ. जी. सिंह कश्यप उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।
5.स्मृति दिवस और प्रभाव 
        उनके स्मृति दिवसों में 2020 की सातवीं पुण्यतिथि वर्चुअल मनाई गई, जिसमें देश भर से लोग शामिल हुए। 2022 में नौवीं, 2023 में दसवीं, 2024 में ग्यारहवीं मनाई गई। इन आयोजनों में उनके दर्शन पर चर्चा होती है। उनकी विरासत आज भी प्रेरणा देती है, और लहरीपुर गाँव उनका जीवंत स्मारक है।


रविवार, 14 सितंबर 2025

किसानों की व्यथा

किसानों की व्यथा पर संत लहरी सिंह कश्यप की शैली में मार्मिक कविता


धरती माँ की गोद में बीज जो बोता है,
पसीने से सींचकर जीवन संवारता है।
भूख मिटाने को अनगिन जनों की,
वह स्वयं ही भूखा सो जाता है।

☀️

सूरज की तपिश झेलकर भी मुस्कुराता है,
बरसात में भीगकर भी खेत सजाता है।
तूफ़ान और ओलों से टूटी उम्मीदें,
फिर भी अगली सुबह नई आशा जगाता है।

🌱

हाथों में दरारें हैं, आँसुओं से भीगी आँखें,
ऋण के बोझ तले दबा जीवन की साखें।
अन्नदाता कहलाता है, पर व्यथा अनकही,
अपनी पीड़ा किससे कहे, किसको सुनाए वही?

⚖️

समाज के हर प्राणी का पेट जो भरता है,
न्याय और सम्मान से फिर क्यों तरसता है?
कभी खेत बिकते हैं, कभी जान गंवाता है,
इतिहास हर युग में किसान ही लुटता है।

🌾

संत लहरी सिंह कहते हैं—
“जब तक अन्नदाता को सच्चा मान न मिलेगा,
राष्ट्र का भाग्य अधूरा, विकास सपना ही रहेगा।
किसान का सम्मान ही राष्ट्र की शान है,
उसकी व्यथा सुनना ही सच्चा धर्म और ज्ञान है।”


संत लहरी सिंह कश्यप और तर्क का महत्व

                       
संत लहरी सिंह कश्यप जी ने सदैव समाज को जागरूक करने, विवेकशील बनाने और अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करने का कार्य किया। उनका यह कथन तर्क की शक्ति और उसकी सामाजिक उपयोगिता पर गहन प्रकाश डालता है। वे मानते थे कि जिस समाज में तर्कशीलता और प्रश्न करने की प्रवृत्ति का विकास नहीं होता, वहाँ अंधविश्वास, मिथ्या आस्थाएँ और कुरीतियाँ पनप जाती हैं। यही कारण है कि ज्ञान का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है और समाज पिछड़ेपन की दलदल में फँस जाता है।

1. तर्क का अभाव और उसका परिणाम तर्क का अर्थ है—किसी भी तथ्य, विचार या आचरण को विवेकपूर्ण ढंग से परखना और उसका आधार समझना। जब लोग तर्क का प्रयोग नहीं करते, तब वे केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करने लगते हैं। यही स्थिति उन्हें अंधविश्वास की ओर ले जाती है। धीरे-धीरे यह अंधविश्वास सामाजिक प्रथाओं और रीतियों का रूप धारण कर लेता है। इस तरह तर्क का अभाव व्यक्ति को स्वतंत्र चिंतन से वंचित कर देता है और समाज में एक जड़ता आ जाती है।

2. अंधविश्वास और कुरीतियों का विस्तार इतिहास गवाह है कि जहाँ तर्क का सम्मान नहीं हुआ, वहाँ अंधविश्वास ने समाज को कमजोर किया। लोगों ने प्राकृतिक घटनाओं को देवताओं के क्रोध से जोड़ा। बीमारियों का इलाज औषधियों से नहीं बल्कि झाड़-फूंक और टोन-टोटकों से करने लगे। जाति, ऊँच-नीच और छुआछूत जैसी कुरीतियाँ भी इसी अंधविश्वास की उपज थीं। संत कश्यप जी का मानना था कि यदि समाज तर्कशील होता, तो वह ऐसी अवैज्ञानिक धारणाओं को कभी स्वीकार नहीं करता। 

3. ज्ञान का मार्ग अवरुद्ध होना               

ज्ञान का अर्थ केवल शिक्षा प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना और नई संभावनाओं के द्वार खोलना है। जब व्यक्ति तर्क नहीं करता तो वह गलत धारणाओं पर विश्वास करने लगता है। ऐसे में ज्ञान का प्रवाह रुक जाता है क्योंकि नई सोच, प्रश्न करने की प्रवृत्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण नष्ट हो जाते हैं। अंधविश्वासी समाज ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सामाजिक सुधार में पिछड़ जाता है। इस प्रकार तर्क के अभाव से ज्ञान का मार्ग अवरुद्ध होकर समाज स्थिर और निर्जीव हो जाता है।

4. तर्कशीलता का सामाजिक महत्व

संत लहरी सिंह कश्यप जी तर्कशीलता को केवल व्यक्तिगत गुण नहीं मानते थे, बल्कि इसे समाज की प्रगति का आधार मानते थे।

 न्याय की स्थापना – तर्क के आधार पर ही सही और गलत का निर्णय किया जा सकता है।

 समानता का विकास – जब लोग तर्क करते हैं तो उन्हें समझ आता है कि जाति, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव अनुचित है।

 वैज्ञानिक दृष्टिकोण – तर्कशीलता ही विज्ञान का मूल है।

सामाजिक सुधार – बाल विवाह, दहेज प्रथा और छुआछूत जैसी कुरीतियाँ तर्कशीलता से ही समाप्त हो सकती हैं।

5. आधुनिक संदर्भ में महत्व 

आज भी समाज में अनेक अंधविश्वास और कुरीतियाँ विद्यमान हैं।ऑनलाइन युग में अफवाहें और झूठी मान्यताएँ तेजी से फैलती हैं। कई बार लोग बिना तर्क किए, बिना सत्यापन के किसी भी सूचना पर विश्वास कर लेते हैं। धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद भी उसी का परिणाम है।

इस स्थिति में संत लहरी सिंह कश्यप जी का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि तर्कशीलता को अपनाना ही सच्चे ज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

6. शिक्षा और तर्क का संबंध

संत जी ने शिक्षा को तर्क और विवेक से जोड़ा। वे मानते थे कि: शिक्षा का उद्देश्य केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना है। यदि शिक्षित व्यक्ति भी अंधविश्वासी है तो वह केवल डिग्रीधारी है, ज्ञानवान नहींसच्ची शिक्षा वही है जो तर्कशील दृष्टिकोण और वैज्ञानिक सोच पैदा करे।

7. समाज को संदेश

संत लहरी सिंह कश्यप जी का यह विचार समाज के लिए गहन संदेश देता है: हमें हर स्थिति में तर्क और विवेक का सहारा लेना चाहिए। परंपराओं का मूल्यांकन तर्क के आधार पर होना चाहिए, न कि अंध स्वीकृति से। जो बातें मानव कल्याण और प्रगति के लिए उपयोगी हों, उन्हें अपनाना चाहिए। जो बातें केवल अंधविश्वास या भय पर आधारित हों, उन्हें त्याग देना चाहिए।

संत लहरी सिंह कश्यप जी का यह विचार हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अंधविश्वासों से मुक्त होकर तर्क और सत्य के मार्ग पर चलें, तभी सच्चे ज्ञान और प्रगति की स्थापना हो सकती है।  इतना ही नही संत जी कहते है कि तर्क का अर्थ है किसी भी विषय पर गंभीरता से विचार और उसका उचित विवेचना करना। ऐसी क्षमता तर्क के माध्यम से ही विकसित होती है। तर्क केवल बहस या वाद-विवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह सत्य और असंत्य, उचित और अनुचित, वास्तविक और काल्पनिक के बीच भेद करने का भी सर्वोत्तम उपाय है। तर्क के माध्यम से मनुष्य ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, विज्ञान को जन्म दिया, समाज की दिशा दी और सभ्यता को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।जीवन में हम विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं और ऐसे में ठोस निर्णय लेना आवश्यक होता है। तर्क हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है। जीवन की वास्तविक शिक्षा तर्क पर आधारित होती है। केवल ज्ञानार्जन करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समस्याओं को तर्क की कसौटी पर परखकर उचित समाधान विकसित करना भी शिक्षा का उद्देश्य है। विज्ञान की पूरी संरचना तर्क पर निर्भर करती है। यदि किसी प्रयोग के परिणाम को केवल स्वीकार कर लिया जाए और उसे तर्क के आधार पर नहीं समझा जाए, तो, इससे विज्ञान का विकास संभव नहीं है। तर्क का अभाव ज्ञान के विकास को अवरुद्ध करता है। और अंधविश्वास एवं कुरीतियों को बढ़ावा देता है। जब तर्क कल्पना के साथ मिल जाता है,, तो सृजनशीलता के नए द्वार खुलते हैं। तर्क ही भविष्य की संभावनाओं के लिए ठोस आधारशिला बनाता है और मानव जीवन को प्रगति के शिखसें तक पहुंचाता है। मनुष्य के लिए तर्क की महत्तां समझना और उसे अपने जीवन में अपनाना आवश्यक है। यह न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज और सभ्यता की प्रगति के लिए भी अनिवार्य है। तर्क के माध्यम से हम अपने विचारों को स्पष्ट कर सकते हैं और एक बेहतर समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।



शनिवार, 13 सितंबर 2025

मनुष्य के भीतर की चेतना का जागरण ही असली उन्नति है: संत लहरी सिंह कश्यप


       संत लहरी सिंह कश्यप जी ने अपने जीवन के अनुभवों और विचारों में समाज को नई दिशा देने का कार्य किया। उनके अनुसार – मनुष्य के भीतर की चेतना का जागरण ही असली उन्नति है। भौतिक सुख-सुविधाएँ अस्थायी हैं, परंतु आत्मिक शांति स्थायी है।  समाज में कोई ऊँच-नीच, भेदभाव या जाति-पाँति का भेद नहीं होना चाहिए। सभी मनुष्य एक ही धरती की संतान हैं। मनुष्यो के  विचारों में पारदर्शिता होनी चाहिए क्योंकि  स्पष्ट और निष्पक्ष विचार ही समाज को आगे बढ़ाते हैं। छुपे हुए स्वार्थ और दोगली सोच समाज के पतन का कारण बनती है।  राष्ट्र का उत्थान तभी संभव है जब हर नागरिक अपने कर्तव्यों को समझे और निभाए। अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन ही सच्चा देशभक्ति का आधार है। संत लहरी सिंह कश्यप कहते है कि गुरु, नेता और प्रशासक की बहुत बड़ी भूमिका होती है गुरुजन ज्ञान से, प्रशासक न्याय से और नेता समुचित दिशा-निर्देशन से समाज को सुमति और सुगति प्रदान करते हैं। यदि ये तीनों अपने दायित्व का निष्ठापूर्वक पालन करें, तो समाज में आध्यात्मिक समुत्थान, समरसता, विचारों में पारदर्शिता और राष्ट्रीय प्रगति में कर्तव्यबोध का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है। गुरुजन का कार्य व्यक्ति के अंतर्मन को प्रकाशित करना है। प्राचीन काल में आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को केवल शिक्षित ही नहीं किया, अपितु उन्हें सक्षम शासक भी बनाया। महर्षि वशिष्ठ और गुरुदेव विश्वामित्र ने श्रीराम-लक्ष्मण के व्यक्तित्व और सद्‌गुणों को लोकोपयोगी और परमार्थी बनाया। गुरुजन शिष्य के जीवन में केवल विद्या ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला में नैपुण्य और परमार्थिक दृष्टि प्रदान करते हैं। प्रशासक समाज के वे महत्वपूर्ण अंग हैं, जो न्याय व्यवस्था के अनुरूप जनसामान्य के अधिकारों की. रक्षा करते हैं। यदि प्रशासक शिथिल होगा, तो निश्चित ही समाज निरंकुश होकर अराजकता में लिप्त हो जाएगा। नेतागण समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाले होते हैं। गांधी जी ने अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर जनता को स्वतंत्रता संग्राम में संगठित किया। एक सच्चा नेता समर्पित जनसेवक होता है, जो जनता के दुख-सुख में साथ खड़ा रहता है। इन तीनों लोगों की भूमिकाएं भिन्न-भिन्न होते हुए भी समाज के कल्याण में पूरक हैं। गुरु व्यक्ति को आत्मशक्ति प्रदान करते हैं, प्रशासक निष्पक्ष और पारदर्शी अनुशासन द्वारा समाज में सुरक्षित वातावरण निर्मित करते हैं और नेतागण सामूहिक कल्याण की दृष्टि से जनसामान्य को कुशल नेतृत्व प्रदानकर उन्हें देश के श्रेष्ठ नागरिक होने का गौरव प्रदान करते हैं। जब इन तीनों का संतुलित समन्वय होता है, तभी समाज में नैतिक जागरण, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय समुन्नति सुनिश्चित 'और सुदृढ़ होती है। संत लहरी सिंह कश्यप जी ने घूम घूम कर लोगो के आत्मिक विकास पर जनजागरण किया है उनके अनुयायी देश के विभिन्न विभिन्न हिस्सों में उ के जीवन दर्शन से प्रेरणा लेते है।

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

संत लहरी सिंह कश्यप: दबे-कुचले समाज के उद्धारक


 सारांश / Abstract


संत लहरी सिंह कश्यप भारतीय समाज के उन महान सुधारकों में से एक थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन दबे-कुचले, शोषित और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। वे मानते थे कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब हर व्यक्ति को समान अधिकार, शिक्षा और सम्मान मिले। उन्होंने जातिगत भेदभाव का विरोध किया, महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की वकालत की, बच्चों के लिए विद्यालय और आश्रम खुलवाए तथा किसानों और मजदूरों के हितों के लिए संघर्ष किया। संत जी का संदेश स्पष्ट था – “शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही समाज को बदलने के रास्ते हैं।” उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम माना और लोकतंत्र में सबसे अंतिम व्यक्ति की आवाज़ को महत्व देने की बात कही। उनका जीवन केवल सामाजिक और राजनीतिक सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि वे नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान पर भी जोर देते थे। उनका सपना एक ऐसे समाज का था जहाँ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव न हो और हर व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।  आज जब समाज असमानता, बेरोजगारी और हिंसा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब संत लहरी सिंह कश्यप के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन दबे-कुचले समाज, महिलाओं, बच्चों, किसानों और मजदूरों के लिए समर्पित रहा। जानिए उनके विचार और योगदान।

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  • सामाजिक समानता

  • आत्मनिर्भर भारत

  • राजनीतिक चेतना

  • नैतिक उत्थान

 प्रस्तावना (H2)

भारतीय समाज में कई संत और सुधारक हुए जिन्होंने शोषित और पीड़ित वर्ग के लिए आवाज़ उठाई। उनमें से एक प्रमुख नाम है संत लहरी सिंह कश्यप।
उनका जीवन मानवता, न्याय और समानता के लिए समर्पित था।

"मनुष्य का मूल्य उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होता है।" – संत लहरी सिंह कश्यप

 जीवन परिचय और प्रेरणा 

  • साधारण किसान परिवार में जन्म।

  • बचपन से ही करुणा और न्याय की भावना।

  • गाँव की गरीबी और शोषण देखकर समाज सुधार का संकल्प।

  • जीवन सादगी, त्याग और संघर्ष का प्रतीक।

 सामाजिक सुधार की दिशा में योगदान 

🔹 जातिगत भेदभाव का विरोध 

  • ऊँच-नीच की प्रथा का खुला विरोध।

  • हर व्यक्ति को समान अधिकार दिलाने का प्रयास।

🔹 महिलाओं के अधिकार 

  • पर्दा प्रथा, बाल विवाह और घरेलू हिंसा का विरोध।

  • बेटियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर बल।

🔹 बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा 

  • गरीब बच्चों के लिए विद्यालयों की स्थापना।

  • बाल मजदूरी का विरोध।

"बच्चे मजदूर नहीं, भविष्य के निर्माता हैं।" – संत लहरी सिंह कश्यप


 शैक्षिक क्रांति 

 विद्यालय और शिक्षा अभियान 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की स्थापना।

  • गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों की शिक्षा पर बल।

व्यावसायिक शिक्षा 

  • युवाओं को तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा की ओर प्रेरित किया।

 नैतिक शिक्षा 

  • सत्य, ईमानदारी और सहिष्णुता पर आधारित शिक्षा पर जोर।

 आर्थिक सुधार और स्वावलंबन 

 किसानों के लिए संघर्ष 

  • उचित मूल्य और सिंचाई सुविधाओं की मांग।

 श्रमिकों के अधिकार 

  • मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और सुरक्षा की वकालत।

 आत्मनिर्भरता 

  • छोटे उद्योगों और स्वदेशी वस्तुओं पर बल।


 राजनीतिक चेतना 

वंचितों की आवाज़ 

  • दलित-पिछड़े वर्गों को राजनीति में भागीदारी के लिए प्रेरित किया।

 लोकतंत्र और समानता 

"लोकतंत्र तभी सफल है जब उसमें समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति की भी आवाज़ सुनी जाए।" – संत लहरी सिंह कश्यप

 नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान 

  • सत्य, ईमानदारी, अहिंसा और सहिष्णुता को जीवन का आधार बनाया।

  • शिक्षा और राजनीति से ऊपर नैतिकता को रखा।


 महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रयास 

  • महिला मंडल की स्थापना।

  • कन्या शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के लिए पहल।

  • बच्चों के लिए विद्यालय और आश्रम की स्थापना।

आदर्श समाज का सपना 

  • बिना भेदभाव का समाज।

  • सबको शिक्षा और सम्मान।

  • महिलाओं की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता।

  • राजनीति = सेवा, न कि सत्ता।

 आज की प्रासंगिकता 

  • शिक्षा → नए भारत की नींव।

  • आर्थिक दृष्टि → आत्मनिर्भर भारत का मार्ग।

  • समानता → सशक्त लोकतंत्र की गारंटी।

निष्कर्ष 

संत लहरी सिंह कश्यप एक संत, सुधारक और क्रांतिकारी विचारक थे। उन्होंने समाज को शिक्षा, समानता, आत्मनिर्भरता और नैतिकता का मार्ग दिखाया। "यदि समाज को बदलना है तो शिक्षा, संगठन और संघर्ष का मार्ग अपनाना होगा।" – संत लहरी सिंह कश्यप


बुधवार, 10 सितंबर 2025

सकारात्मक सोच हमारे कार्य करने की क्षमता को बढ़ाता है — संत लहरी सिंह कश्यप

 

      लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी का यह संदेश हमें यह सिखाता है कि मन का दृष्टिकोण ही जीवन की दिशा तय करता है। जब हम सकारात्मक सोच के साथ काम करते हैं तो— कठिनाई भी अवसर बन जाती है। मन में उत्साह और ऊर्जा बनी रहती है।  आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है।  लक्ष्य पाना आसान हो जाता है। सकारात्मक सोच केवल विचार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति है, जो इंसान के कार्य करने की क्षमता को बढ़ाकर उसे जीवन में सफलता और शांति दोनों प्रदान करती है। सकारात्मक सोच हमारे कार्य करने की क्षमता को बढ़ाता है। हमें रचनात्मक बनाता है। हमारे भीतर नवीन सामर्थ्य का संचार करता है। यह आशा की सुंगध लेकर आता है, जिससे हमें अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इसके उलट यदि हम निराशा के जाल में फंस जाते हैं तो प्रगति की दिशा से भटक, जाते हैं। तब हम जहां हैं, वहां से भी नीचे फिसल जाएंगे। निराशा हमारे संकल्पों पर ग्रहण की कालिमा लगा देती है। उसके पश्चात स्वप्न टूटने लगते हैं। हम बिखरने लगते हैं। कोई भी कार्य ठीक गति से नहीं होता। जीवन में हताशा एवं नैराश्य दस्तक देने लगते हैं। स्मरण रहे कि आशा की किरण ही सफलता के आंगन को आलोकित करती हैं। एक बुजुर्ग इसी आशा में पेड़ लगाता है कि कल को आने वाली पीढ़ी इसके फलों का आस्वादन करेगी। वह यह सोचे कि उसे अब ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहना है तो वह क्यों फलदार पेड़ लगाए? ऐसी स्थिति में तो वह निराशा के कूप में डूबकर तड़पने लगेगा। निराशा का तिमिर उसे कचोटने लगेगा। अगर वह निराशा की ऐसी पतवार थामे चलेगा तो मझदार में ही डूब जाएगा। जबकि आशा की सुधा जीवन को लालित्य प्रदान करती है। वह उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। निराशा का अंधकार हमारी क्षमताओं को लीलता है। हम अपनी सामर्थ्य को भूल जाते है। निराशा हमें भयाक्रांत करती है और समय के साथ उससे जुड़े भय और गहरे होते जाते हैं। इस कारण संभव दिख रही सफलता भी असंभव लगने लगती है। जीवन में नैराश्य का मर्दन अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा हम उन्नति नहीं कर पाएंगे। निराशा का जन्म नकारात्मकता से होता है। नकारात्मकता ही निराशा को पोषित करती है। जीवन में नकारात्मकता से दूर रहकर ही निराशा का शमन किया जा सकता है। सकारात्मकता का आवरण ही निराशा के प्रहारों से हमें बचा सकता है।



सोमवार, 8 सितंबर 2025

वृद्धावस्था में देखभाल और संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण


संत लहरी सिंह कश्यप जी ने जीवन के हर पहलू पर गहन विचार किए हैं। वृद्धावस्था (बुढ़ापा) के समय की देखभाल पर उनके दृष्टिकोण में मानवीय संवेदना और सामाजिक कर्तव्य का विशेष महत्व है।

  1. सम्मान और आदर
    संत लहरी सिंह कश्यप मानते थे कि वृद्धजन समाज का अनुभव और ज्ञान का खजाना होते हैं। उनकी देखभाल केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक सम्मान के साथ होना चाहिए।

  2. परिवार की जिम्मेदारी
    उन्होंने कहा कि वृद्ध माता-पिता या बुजुर्गों की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। बच्चों का यह कर्तव्य है कि वे अपने बड़ों को कभी अकेला महसूस न होने दें।

  3. समाज में सहारा
    संत जी का मानना था कि केवल परिवार ही नहीं, बल्कि समाज को भी वृद्धजनों की मदद करनी चाहिए। वृद्धाश्रम या सामुदायिक सेवा केन्द्र केवल सहारा नहीं, बल्कि बुजुर्गों को आत्मीयता और अपनापन देने का साधन होना चाहिए।

  4. शारीरिक और मानसिक देखभाल
    बुजुर्गों की जरूरतें विशेष होती हैं। संत लहरी सिंह कश्यप कहते थे कि उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना, उन्हें समय पर दवा और आराम देना, और उनके साथ संवाद बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी देखभाल है।

  5. आध्यात्मिक सहारा
    वृद्धावस्था में अक्सर व्यक्ति अकेलापन और कमजोरी महसूस करता है। संत जी का विचार था कि इस समय आध्यात्मिकता, भजन, ध्यान और सत्संग उन्हें शांति और संतोष प्रदान करते हैं।

  6. युवाओं को संदेश
    संत लहरी सिंह कश्यप युवाओं को हमेशा यह प्रेरणा देते थे कि जैसे तुम अपने बुजुर्गों का आदर करोगे, वैसे ही आने वाले समय में तुम्हें भी समाज और परिवार से वही सम्मान मिलेगा और अंत मे संत लहरी सिंह कश्यप का संदेश स्पष्ट है — वृद्धजनों की सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि यह सबसे बड़ा धर्म और मानवता है।


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण था कि चिन्ता त्यागकर आत्मविश्वास, परिश्रम और विवेक को अपनाना ही जीवन में सफलता और शांति का मार्ग है।

संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण था कि चिन्ता त्यागकर आत्मविश्वास, परिश्रम और विवेक को अपनाना ही जीवन में सफलता और शांति का मार्ग है।

 

  लहरीपुर गाँव बसाने वाले  संत लहरी सिंह कश्यप जी का दृष्टिकोण चिन्ता के विषय में अत्यंत व्यावहारिक और जीवनोपयोगी था। वे मानते थे कि –चिन्ता किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह समाधान की राह को और अधिक कठिन बना देती है। उनका कहना था कि "चिन्ता चिता के समान है" – यह धीरे-धीरे मनुष्य की आंतरिक शांति, स्वास्थ्य और ऊर्जा को नष्ट कर देती है। संत लहरी सिंह कश्यप का संदेश था कि व्यक्ति को समस्याओं से डरकर चिन्तित नहीं होना चाहिए, बल्कि कर्म करके, विवेक लगाकर उसका समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए वे कहते थे कि निष्क्रिय होकर बैठने और चिन्ता करने से बेहतर है कि थोड़ा-सा भी प्रयास किया जाए। उनका दृष्टिकोण था कि चिन्ता मुख्यतः भूत और भविष्य से जुड़ी होती है। भूतकाल की घटनाओं पर चिन्ता करना निरर्थक है क्योंकि उसे बदला नहीं जा सकता। भविष्य की चिन्ता करना भी व्यर्थ है क्योंकि वह अभी आया ही नहीं। वे हमेशा वर्तमान क्षण में जीने और वर्तमान कर्म पर ध्यान देने की प्रेरणा देते थे। संत जी का मानना था कि चिन्ता करने से मनुष्य का आत्मबल टूटता है इसके विपरीत, यदि मनुष्य धैर्य, विश्वास और परिश्रम से आगे बढ़े तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी सरल हो सकती हैं। वे लोगों को समझाते थे कि चिन्ता केवल व्यक्ति की नहीं बल्कि परिवार और समाज की शांति को भी भंग करती है। इसीलिए वे समूहिक सहयोग और साझा समस्याओं के समाधान पर जोर देते थे। , संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण था कि चिन्ता त्यागकर आत्मविश्वास, परिश्रम और विवेक को अपनाना ही जीवन में सफलता और शांति का मार्ग है। जीवन में समय-समय पर चिंता का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चिंता के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं। प्रायः नकारात्मक * प्रभावों पर अधिक चर्चा होती है। इस संदर्भ में चिंता को चिता समान कहा जाता है। यह सत्य है कि चिंता का अतिरेक व्यक्ति को आशंका, भय. घबराहट या अनिद्रा से ग्रस्त कर सकता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चिंताग्रस्त व्यक्ति अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असफल हो सकता है।यह मान लेना उचित नहीं कि जीवन में चिंता होना बिल्कुल गलत है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्ति में अपनी परिस्थितियों और उत्तरदायित्यों के अनुरूप सम्यक स्तर की चिंता होनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसी विद्यार्थी की अगले दिन परीक्षा है, तो उसे इसकी चिंता होनी चाहिए। अन्यथा वह परीक्षा की तैयारी में ध्यान नहीं दे पाएगा और उसका परीक्षा-फल प्रभावित हो सकता है। उपयुक्त स्तर की चिंता हमें अपने उद्देश्यों के प्रति प्रेरित करती है और सतर्क रखती है, जिससे हम त्रुटियों से बचते हैं।

      इसलिए चिंता के दुष्प्रभावों से सावधान रहने के साथ ही हमें इसकी सकारात्मक भूमिकाओं के महत्व को भी समझना चाहिए। सामान्यतः जो चिंता होती है, उसके स्पष्ट कारण होते हैं और यह अस्थायी होती है। जब कारण समाप्त हो. जाते हैं, तो चिंता भी समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत कभी-कभी व्यक्ति में ऐसी चिंता देखी जाती है, जिसका कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता और जो निरंतर बनी रहती है। ऐसी असामान्य चिंता व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है, जिसके लिए उचित उपचार आवश्यक होता है। इस प्रकार चिंता को एक सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है, क्योंकि यह हमें जिम्मेदार बनाती है और हमारे जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। संत लहरी सिंह प्रवचन करते समय सुनाते रहते थे कि 


चिन्ता मत कर भाई! 

अरे भाई, चिन्ता से कुछ ना होगा,
चिन्ता तो चिता समान।
मन को खाये, तन को गालै,
बुझा दे जीवन की जान।

बीती बात पे क्यों पछतावे?
गुज़री चीज़ न आवै।
आवन वाले कल की चिन्ता,
काहे को मन डावै?

आज जो हाथ में पल है तेरा,
उसे ही साचा मान।
कर्म करै जा, हिम्मत धरै जा,
फिर मिलेगा सम्मान।

चिन्ता करैगा तो मन टूटैगा,
राह और कठिनाई होय।
विश्वास धर ले, श्रम में जुट जा,
सुख-शांति अपने संग होय।

कहैं संत लहरी सिंह कश्यप—
"चिन्ता छोड़, भरोसा धर।
कर्म करैगा नेक इन्सां,
दुख-दर्द सब छूटि जड़।"


बुधवार, 3 सितंबर 2025

समय का सम्मान करना जिसने सीख लिया, वह जिंदगी की दौड़ में पीछे नही रह सकता: संत लहरी सिंह कश्यप

लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन घुम्मकड़ के प्रकार का था वे लोगो को समझाते रहते थे समय की  महत्ता बहुत बड़ी होती है, सूरज समय पर निकलता है और छिपता है ,पेड़ पौधों पर फल फूल अपने समय पर आते है । समय बहुत कीमती है, हर मनुष्य के लिए वर्ष, माह, सप्ताह का समय और दिन के घंटे निर्धारित है। इसी अवधि में हर कोई जीवन जीता है। संयोगवश कोई सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता है तो कोई विफलता के दलदल में फंसा रह जाता है। इसकी पड़ताल करें तो यही पाएंगे कि सफलता प्राप्त करने वाले ने योजनाबद्ध ढंग से समय का सदुपयोग किया। आज जो काम करना है, उसे कल पर नहीं टालकर कार्य को समय पर पूर्ण कर लिया। जबकि विफल होने में आलस्य सबसे बड़ा दोषी होता है। इसका सार यही है कि हर विफल व्यक्ति ने समय के महत्वा को नहीं समझा। आज कोई काम करना है तो उसे टालता रहा। इस क्रम में जब काम का अंबार लग जाता है, तब समझ नहीं आता कि शुरुआत कहां से की जाए? जब काम की दिशा में कदम बढ़ाए तो पता चलता है कि बहुत विलंब हो चुका है। उसका समय निकल गया है। ऐसी स्थिति में कल को कोसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं रहता। कल को कोसने का मतलब खुद को कोसना, क्योंकि समय से कदम नहीं उठाने के लिए समय नहीं, बल्कि खुद वही व्यक्ति दोषी है।

     महाभारत में अर्जुन भी शस्त्र उठाने से हिचकने लगे थे। अर्जुन की इस मनःस्थिति को देखकर ही भगवान श्रीकृष्ण को उपदेश देना पड़ा। श्रीकृष्ण द्वारा गीता का उपदेश सिर्फ दो पक्षों के बीच किसी युद्ध के लिए नहीं है, बल्कि आंतरिक जगत को सजग और चैतन्य करने के लिए है। शस्त्र का अर्थ भी कर्म होता है। मनुष्य की भुजाएं, मन और मस्तिष्क सब शस्त्र हैं। याद रहे कि जो बीत गया, कितना भी अनुकूल वातावरण रहा हो, वह लौटकर आने वाला नहीं। इसलिए आज फिर वही गलती नहीं दोहरानी चाहिए। विश्व बहुत विराट है। समय शत्रु है तो मित्र भी है। समय का सम्मान करना जिसने सीख लिया, वह जिंदगी की दौड़ में पीछे रह ही नहीं सकता। इसमें बीते दिनों को कोसने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। संत लहरी सिंह कश्यप जी एक बात और कहते थे कि समय और अवसर को हमेशा पहचानना चाहिए ‘गई गई को जाण दे ,रही रही को राख। कभी रही हुई  भी चली जाय गई हुई के साथ।।’ वास्तव में संत लहरी सिंह कश्यप जी की जीवन-दृष्टि और उनके व्यावहारिक दर्शन को उजागर करती है।संत लहरी सिंह कश्यप जी का आशय है कि बीते को छोड़ो –वे कहते थे कि बीता हुआ समय, अवसर या परिस्थिति वापस नहीं आता। इसलिए उस पर रोना-धोना व्यर्थ है। “गई गई को जाण दे” – यानी जो बीत चुका उसे भूल जाओ। वर्तमान को सँभालो –
जो हमारे पास आज है – चाहे वह समय हो, संबंध हो, साधन हो या अवसर – उसे समझदारी से सुरक्षित रखना चाहिए। “रही रही को राख” – जो है, उसी का मूल्य समझो। उनकी ये बात अनिश्चितता का बोध कराती है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। जो आज हमारे पास है, वह भी कल को छिन सकता है।
“कभी रही हुई भी चली जाय, गई हुई के साथ” – इसलिए वर्तमान का सदुपयोग ही सर्वोत्तम नीति है। संत लहरी सिंह कश्यप जी इस दोहे के माध्यम से लोगों को समझाते थे कि –पछतावा छोड़ो, क्योंकि वह केवल दुःख बढ़ाता है। भविष्य की चिंता छोड़ो, क्योंकि वह अनिश्चित है। वर्तमान में जियो और कर्म करो, यही जीवन का असली धन है। यही उनकी जगत-कल्याण दृष्टि थी – वे हमेशा लोगों को जागरूक करते थे कि समय, अवसर और जीवन की कद्र करो।