रविवार, 14 सितंबर 2025

किसानों की व्यथा

किसानों की व्यथा पर संत लहरी सिंह कश्यप की शैली में मार्मिक कविता


धरती माँ की गोद में बीज जो बोता है,
पसीने से सींचकर जीवन संवारता है।
भूख मिटाने को अनगिन जनों की,
वह स्वयं ही भूखा सो जाता है।

☀️

सूरज की तपिश झेलकर भी मुस्कुराता है,
बरसात में भीगकर भी खेत सजाता है।
तूफ़ान और ओलों से टूटी उम्मीदें,
फिर भी अगली सुबह नई आशा जगाता है।

🌱

हाथों में दरारें हैं, आँसुओं से भीगी आँखें,
ऋण के बोझ तले दबा जीवन की साखें।
अन्नदाता कहलाता है, पर व्यथा अनकही,
अपनी पीड़ा किससे कहे, किसको सुनाए वही?

⚖️

समाज के हर प्राणी का पेट जो भरता है,
न्याय और सम्मान से फिर क्यों तरसता है?
कभी खेत बिकते हैं, कभी जान गंवाता है,
इतिहास हर युग में किसान ही लुटता है।

🌾

संत लहरी सिंह कहते हैं—
“जब तक अन्नदाता को सच्चा मान न मिलेगा,
राष्ट्र का भाग्य अधूरा, विकास सपना ही रहेगा।
किसान का सम्मान ही राष्ट्र की शान है,
उसकी व्यथा सुनना ही सच्चा धर्म और ज्ञान है।”


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