बुधवार, 3 सितंबर 2025

समय का सम्मान करना जिसने सीख लिया, वह जिंदगी की दौड़ में पीछे नही रह सकता: संत लहरी सिंह कश्यप

लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन घुम्मकड़ के प्रकार का था वे लोगो को समझाते रहते थे समय की  महत्ता बहुत बड़ी होती है, सूरज समय पर निकलता है और छिपता है ,पेड़ पौधों पर फल फूल अपने समय पर आते है । समय बहुत कीमती है, हर मनुष्य के लिए वर्ष, माह, सप्ताह का समय और दिन के घंटे निर्धारित है। इसी अवधि में हर कोई जीवन जीता है। संयोगवश कोई सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता है तो कोई विफलता के दलदल में फंसा रह जाता है। इसकी पड़ताल करें तो यही पाएंगे कि सफलता प्राप्त करने वाले ने योजनाबद्ध ढंग से समय का सदुपयोग किया। आज जो काम करना है, उसे कल पर नहीं टालकर कार्य को समय पर पूर्ण कर लिया। जबकि विफल होने में आलस्य सबसे बड़ा दोषी होता है। इसका सार यही है कि हर विफल व्यक्ति ने समय के महत्वा को नहीं समझा। आज कोई काम करना है तो उसे टालता रहा। इस क्रम में जब काम का अंबार लग जाता है, तब समझ नहीं आता कि शुरुआत कहां से की जाए? जब काम की दिशा में कदम बढ़ाए तो पता चलता है कि बहुत विलंब हो चुका है। उसका समय निकल गया है। ऐसी स्थिति में कल को कोसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं रहता। कल को कोसने का मतलब खुद को कोसना, क्योंकि समय से कदम नहीं उठाने के लिए समय नहीं, बल्कि खुद वही व्यक्ति दोषी है।

     महाभारत में अर्जुन भी शस्त्र उठाने से हिचकने लगे थे। अर्जुन की इस मनःस्थिति को देखकर ही भगवान श्रीकृष्ण को उपदेश देना पड़ा। श्रीकृष्ण द्वारा गीता का उपदेश सिर्फ दो पक्षों के बीच किसी युद्ध के लिए नहीं है, बल्कि आंतरिक जगत को सजग और चैतन्य करने के लिए है। शस्त्र का अर्थ भी कर्म होता है। मनुष्य की भुजाएं, मन और मस्तिष्क सब शस्त्र हैं। याद रहे कि जो बीत गया, कितना भी अनुकूल वातावरण रहा हो, वह लौटकर आने वाला नहीं। इसलिए आज फिर वही गलती नहीं दोहरानी चाहिए। विश्व बहुत विराट है। समय शत्रु है तो मित्र भी है। समय का सम्मान करना जिसने सीख लिया, वह जिंदगी की दौड़ में पीछे रह ही नहीं सकता। इसमें बीते दिनों को कोसने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। संत लहरी सिंह कश्यप जी एक बात और कहते थे कि समय और अवसर को हमेशा पहचानना चाहिए ‘गई गई को जाण दे ,रही रही को राख। कभी रही हुई  भी चली जाय गई हुई के साथ।।’ वास्तव में संत लहरी सिंह कश्यप जी की जीवन-दृष्टि और उनके व्यावहारिक दर्शन को उजागर करती है।संत लहरी सिंह कश्यप जी का आशय है कि बीते को छोड़ो –वे कहते थे कि बीता हुआ समय, अवसर या परिस्थिति वापस नहीं आता। इसलिए उस पर रोना-धोना व्यर्थ है। “गई गई को जाण दे” – यानी जो बीत चुका उसे भूल जाओ। वर्तमान को सँभालो –
जो हमारे पास आज है – चाहे वह समय हो, संबंध हो, साधन हो या अवसर – उसे समझदारी से सुरक्षित रखना चाहिए। “रही रही को राख” – जो है, उसी का मूल्य समझो। उनकी ये बात अनिश्चितता का बोध कराती है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। जो आज हमारे पास है, वह भी कल को छिन सकता है।
“कभी रही हुई भी चली जाय, गई हुई के साथ” – इसलिए वर्तमान का सदुपयोग ही सर्वोत्तम नीति है। संत लहरी सिंह कश्यप जी इस दोहे के माध्यम से लोगों को समझाते थे कि –पछतावा छोड़ो, क्योंकि वह केवल दुःख बढ़ाता है। भविष्य की चिंता छोड़ो, क्योंकि वह अनिश्चित है। वर्तमान में जियो और कर्म करो, यही जीवन का असली धन है। यही उनकी जगत-कल्याण दृष्टि थी – वे हमेशा लोगों को जागरूक करते थे कि समय, अवसर और जीवन की कद्र करो।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें