संत लहरी सिंह कश्यप एक ऐसे महान समाजसेवी और संत थे जिन्होंने अपने जीवन को पिछड़े वर्गों के उत्थान, सामाजिक न्याय और शिक्षा के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। वे उत्तर प्रदेश के शामली जिले में लहरीपुर गाँव के संस्थापक थे और उनके कार्यों ने हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। उनका जीवन दर्शन शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर आधारित था, जो दबे-कुचले समाज को मजबूत बनाने का मूल मंत्र था। इस जीवन परिचय में हम उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा, उनके योगदान, दर्शन और विरासत पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिसमें उपलब्ध स्रोतों से प्राप्त जानकारी को शामिल किया गया है। यह परिचय उपलब्द जानकारी के आधार पर सरल शब्दों में लिखा गया है, जिसमें उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को कवर किया गया है, हालांकि उपलब्ध जानकारी सीमित होने के कारण कुछ भागों में सामाजिक संदर्भ और उनके कार्यों के प्रभाव को विस्तार से समझाया गया है।
1.प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
संत लहरी सिंह कश्यप का जन्म 7 जुलाई 1938 को हुआ था। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, जहाँ उनके पिता का नाम श्री छित्तर सिंह कश्यप और माता का नाम बकतावरी देवी था। उनके परिवार में सात भाई-बहन थे, जिनमें बड़े भाई कलीराम सिंह कश्यप और ब्रह्म सिंह कश्यप (जिनका देहांत हो चुका है), छोटे भाई पूरण सिंह कश्यप और ओमपाल सिंह कश्यप (इनका भी निधन हो चुका है), तथा बहनें बुगली देवी (स्वर्गीय) और लहरो देवी शामिल थे। उनकी पत्नी का नाम रामप्यारी देवी था और उनके चार पुत्र तथा दो पुत्रियाँ है सबसे बड़े पुत्र डॉ०जी सिंह कश्यप पी जी कॉलेज गाजीपुर में आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष है वे विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए जैसे अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष,राष्ट्रीय सामाजिक न्याय चेतना ट्रस्ट के संस्थापक, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग पब्लिकेशन ट्रस्ट के संस्थापक और महासचिव है लगभग 10 वर्षो तक बामसेफ के गाजीपुर जिले के अध्यक्ष रहे है,तथा अर्जक संघ के भी समर्थक है,डॉ० जी० सिंह कश्यप की पत्नी सुनीता देवी सुशिक्षित एवं सफल गृहणी है, दूसरे पुत्र किरणपाल सिंह कश्यप गाँव लहरीपुर मे संत लहरी सिंह धाम आश्रम के संचालक है किरणपाल सिंह की पत्नी बृजेश देवी समाज सेविका है ,तीसरे पुत्र डॉ० सतीश कुमार कश्यप समाजशास्त्र विषय मे डॉक्टरेट किये हुए है और नेचर बायो फ़ूड कंपनी में काम करते है इनकी पत्नी श्रीमती वन्दना एम०ए० बी०एड० है,चौथे पुत्र डॉ० सत्यपाल सिंह कश्यप नोएडा स्थित आई आई एम टी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है वे इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में बी०टेक० एम०टेक० है और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी से डॉक्टरेट है इनकी पत्नी श्रीमती अंजू देवी शिक्षिका है।
यह जानकारी उनके स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों और वीडियो दस्तावेजों से प्राप्त हुई है, जो उनके जीवन को एक साधारण किसान परिवार से जोड़ती है। उनका प्रारंभिक जीवन उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बीता, जहाँ उस समय पिछड़े वर्गों में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी थी। लहरी सिंह कश्यप ने केवल मिडिल तक की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता और सामाजिक चेतना बचपन से ही स्पष्ट थी। उस समय भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दौर में था, जहाँ सामाजिक असमानता, जातिवाद और आर्थिक पिछड़ापन प्रमुख मुद्दे थे। कश्यप समाज, जो धीवर, झींवर, ढींवर, मांझी, केवट, बिंद, कहार आदि लगभग 140 से अधिक नामों से जाना जाता है, अति पिछड़े वर्गों में आता था। इस समाज में महाराजा गुहराज, निषादराज, हिरण्यकश्यप, हिरण्यधनु और एकलव्य जैसे ऐतिहासिक महापुरुष जन्मे थे, लेकिन आधुनिक काल में यह समाज शिक्षा और अधिकारों से वंचित था।
लहरी सिंह कश्यप के बचपन में परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। उनके पिता छित्तर सिंह कश्यप एक किसान थे, और परिवार कृषि पर निर्भर था। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें जल्दी ही समाज की असमानताओं से परिचित करा दिया। वे देखते थे कि कैसे पिछड़े वर्गों को शासन-प्रशासन में उचित भागीदारी नहीं मिलती, और अशिक्षा, अज्ञानता तथा सामाजिक दब्बूपन उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। इसने उनके मन में सामाजिक न्याय की भावना को जन्म दिया। युवावस्था में वे पाखंडवाद, अंधविश्वास और बेकार के रीतिरिवाजों के खिलाफ खड़े होने लगे। उन्होंने शिक्षा को उन्नति का मूल मंत्र माना और लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित करना शुरू किया।
उनकी शादी रामप्यारी देवी से हुई, जो उनके जीवन की साथी बनीं। परिवार में चार पुत्र और दो पुत्रियाँ होने से उनका दायित्व बढ़ा, लेकिन उन्होंने कभी व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक कार्यों से ऊपर नहीं रखा। उनके एक सबसे बड़े पुत्र डॉ. जी. सिंह कश्यप, जो जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के प्रोफेसर हैं, उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और सोशल मीडिया पर उनके स्मृति दिवसों की जानकारी साझा करते हैं।
लहरी सिंह कश्यप का प्रारंभिक जीवन एक संघर्षपूर्ण यात्रा थी, जहाँ उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज के उत्थान की नींव रखी। उनका मानना था कि "शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही समाज बदलने का रास्ता है। यह दर्शन उनके बचपन की अनुभवों से निकला, जहाँ उन्होंने देखा कि कैसे जातिवाद और आर्थिक असमानता लोगों को दबाए रखती है।
उनके जीवन के इस चरण में, 1950-60 के दशक में भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन चल रहे थे। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर वे पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए जागरूक हुए। उनकी शिक्षा भले ही औपचारिक रूप से सीमित थी, लेकिन आत्म-शिक्षा ने उन्हें एक विचारक बना दिया। वे ग्रामीण क्षेत्रों में घूमकर लोगों से बात करते, उनकी समस्याएँ सुनते और समाधान सुझाते। यह अवधि उनके जीवन की आधारशिला बनी, जहाँ उन्होंने महसूस किया कि पिछड़े समाज को एकजुट करने की आवश्यकता है। कश्यप समाज की विभिन्न उपजातियों को एक मंच पर लाने का प्रयास उन्होंने इसी समय शुरू किया। उनका परिवार उनके इस मिशन में सहयोगी रहा, और रामप्यारी देवी ने घर संभालकर उन्हें सामाजिक कार्यों के लिए स्वतंत्र किया।
इस प्रारंभिक जीवन ने उन्हें एक संत की तरह बनाया, जहाँ व्यक्तिगत सुख से ऊपर सामाजिक न्याय को रखा गया। उनके जीवन की यह नींव आगे के योगदानों के लिए मजबूत आधार बनी, और उन्होंने सिद्ध किया कि साधारण पृष्ठभूमि से भी असाधारण कार्य किए जा सकते हैं।
2.लहरीपुर गाँव की स्थापना
संत लहरी सिंह कश्यप के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लहरीपुर गाँव की स्थापना है, जिसे उन्होंने 1968 में बसाया। यह गाँव उत्तर प्रदेश के शामली जिले में ऊन कस्बे से ऊन-चौसाना मार्ग पर लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित है। लहरीपुर का नाम उनके नाम पर रखा गया, जो उनके संघर्ष और दृष्टि का प्रतीक है। उस समय ग्रामीण भारत में पिछड़े वर्गों के लिए अलग बसावट की कमी थी, और वे मुख्यधारा से कटे हुए थे। लहरी सिंह कश्यप ने महसूस किया कि समाज की उन्नति के लिए एक स्वतंत्र और संगठित स्थान की आवश्यकता है, जहाँ शिक्षा और एकता पर जोर दिया जा सके।
1960 के दशक में भारत में भूमि सुधार और ग्रामीण विकास के प्रयास चल रहे थे, लेकिन पिछड़े वर्गों को इसका लाभ कम मिलता था। लहरी सिंह कश्यप ने देश भर में भ्रमण कर पिछड़े समाज की स्थिति का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि कश्यप समाज विभिन्न नामों से बिखरा हुआ है और सामाजिक न्याय से वंचित है। इसी क्रम में उन्होंने लहरीपुर की स्थापना का निर्णय लिया। यह गाँव न केवल एक बसावट था, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग था, जहाँ दबे-कुचले लोग एकजुट होकर रह सकें। गाँव की स्थापना में उन्होंने स्थानीय लोगों को शामिल किया और कृषि, शिक्षा तथा सामुदायिक विकास पर फोकस किया।
लहरीपुर की स्थापना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। उस समय भूमि अधिग्रहण और बसावट के लिए प्रशासनिक बाधाएँ थीं, लेकिन लहरी सिंह कश्यप के नेतृत्व में लोगों ने मिलकर इसे संभव बनाया। गाँव में स्कूल, सामुदायिक केंद्र और कृषि सुविधाएँ विकसित की गईं। उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी और गाँव के बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह गाँव कश्यप समाज के लिए एक मॉडल बना, जहाँ महिलाओं, बच्चों, किसानों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की जाती थी।
उनके दर्शन के अनुसार, "मनुष्य का मूल्य उसकी जाति नहीं, उसके कर्म और चरित्र से है," जिसने गाँव में जातिवाद को कम करने में मदद की। गाँव की स्थापना के बाद, लहरी सिंह कश्यप ने इसे सामाजिक न्याय का केंद्र बनाया। वे देश के विभिन्न राज्यों में घूमकर लोगों को लहरीपुर के मॉडल से अवगत कराते। यहाँ पर अति पिछड़े समाज को एकजुट करने के कार्यक्रम आयोजित होते। गाँव में शिक्षा के लिए प्रयास किए गए, और कई लोग उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में पहुँचे। लहरीपुर आज भी उनके योगदान का जीवंत उदाहरण है, जहाँ हर साल उनके स्मृति दिवस पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
इस स्थापना ने उनके जीवन को नई दिशा दी। यह न केवल एक भौगोलिक स्थान था, बल्कि उनके संघर्ष का फल था। लहरीपुर ने साबित किया कि संगठन से सामाजिक बदलाव संभव है, और यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
3.सामाजिक कार्य और योगदान
संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन सामाजिक कार्यों से भरा पड़ा था। उन्होंने अति पिछड़े समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। उनका मुख्य फोकस अशिक्षा, अज्ञानता, मलिनता और सामाजिक दब्बूपन को दूर करना था। वे पाखंडवाद, अंधविश्वास और बेकार के रीतिरिवाजों के घोर विरोधी थे। उन्होंने शिक्षा को उन्नति का मार्ग बताया और लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया। उनके कार्यों ने दबे कुचले एवं कश्यप समाज और अन्य पिछड़े वर्गों को एक नई पहचान दी।
उनके सामाजिक कार्यों की शुरुआत युवावस्था से हुई, जब उन्होंने देखा कि पिछड़े वर्ग शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी से वंचित हैं। उन्होंने देश के सभी राज्यों में भ्रमण किया और जनजागरण अभियान चलाया। यह अभियान अति पिछड़े जातियों के लिए था, जहाँ उन्होंने विभिन्न उपजातियों को एकजुट करने का प्रयास किया। अकेले कश्यप समाज की लगभग 140 से अधिक उपजातियाँ जैसे धीवर, झींवर, मांझी, केवट आदि को उन्होंने एक मंच पर लाया। उनके अभियान ने लोगों में जागरूकता फैलाई और उन्हें अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित किया।
लहरी सिंह कश्यप महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के रक्षक थे। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कार्य किया, जहाँ शिक्षा और समानता पर जोर दिया। किसानों और मजदूरों के लिए वे सच्चे साथी थे, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उनका संदेश था कि "दबे-कुचले समाज की आवाज बनो," जो उनके कार्यों में झलकता है। उन्होंने मानवता, न्याय और समानता के लिए जीवन समर्पित किया। उनके योगदान में लहरीपुर गाँव की स्थापना प्रमुख है, लेकिन इससे आगे उन्होंने शिक्षा संस्थानों की स्थापना में योगदान दिया। गाँव में स्कूल और कॉलेज स्थापित करने में उनकी भूमिका थी, जिससे हजारों छात्र लाभान्वित हुए। उन्होंने बौद्ध और अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर समाज को संगठित किया। उनके कार्यों ने पिछड़े वर्गों में उच्च शिक्षा और नौकरियों को बढ़ावा दिया।
उनके जीवन दर्शन पर आधारित कार्यक्रमों में संविधान की शपथ, सरवधर्म प्रार्थना और वैचारिक संगोष्ठियाँ शामिल होती हैं। उनके स्मृति दिवस पर आयोजित घटनाएँ उनके योगदान को याद करती हैं। उदाहरण के लिए, 2022 में नौवें स्मृति दिवस पर झंडारोहण, राष्ट्रगान और सामाजिक उत्थान पर चर्चा हुई। 2023 में दसवें स्मृति दिवस पर प्रेरणा शक्ति ज्योति यात्रा निकाली गई। 2024 में 11वें स्मृति दिवस पर धूमधाम से मनाया गया। उनके कार्यों का प्रभाव आज भी दिखता है। कश्यप समाज में उनकी वजह से जागरूकता आई, और कई लोग राजनीति और शिक्षा में आगे बढ़े। उन्होंने सिद्ध किया कि साधारण व्यक्ति भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
4.दर्शन और विचारधारा
संत लहरी सिंह कश्यप का दर्शन शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर आधारित था। उन्होंने कहा, "शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही समाज बदलने का रास्ता है। वे मानते थे कि मनुष्य का मूल्य जाति से नहीं, कर्म और चरित्र से है। उनका दर्शन अंबेडकर और बुद्ध से प्रेरित था, जहाँ सामाजिक न्याय प्रमुख था। वे अंधविश्वास के खिलाफ थे और शिक्षा को मुक्ति का साधन मानते थे। उनके विचारों ने पिछड़े समाज को एकजुट किया।
मृत्यु और विरासत
संत लहरी सिंह कश्यप का निधन 12 अक्टूबर 2013 को हुआ। उनकी मृत्यु के बाद हर साल स्मृति दिवस मनाया जाता है। उनकी विरासत शिक्षा और न्याय में जीवित है। उनके पुत्र डॉ. जी. सिंह कश्यप उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।
5.स्मृति दिवस और प्रभाव
उनके स्मृति दिवसों में 2020 की सातवीं पुण्यतिथि वर्चुअल मनाई गई, जिसमें देश भर से लोग शामिल हुए। 2022 में नौवीं, 2023 में दसवीं, 2024 में ग्यारहवीं मनाई गई। इन आयोजनों में उनके दर्शन पर चर्चा होती है। उनकी विरासत आज भी प्रेरणा देती है, और लहरीपुर गाँव उनका जीवंत स्मारक है।
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