संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण था कि चिन्ता त्यागकर आत्मविश्वास, परिश्रम और विवेक को अपनाना ही जीवन में सफलता और शांति का मार्ग है।
लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी का दृष्टिकोण चिन्ता के विषय में अत्यंत व्यावहारिक और जीवनोपयोगी था। वे मानते थे कि –चिन्ता किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह समाधान की राह को और अधिक कठिन बना देती है। उनका कहना था कि "चिन्ता चिता के समान है" – यह धीरे-धीरे मनुष्य की आंतरिक शांति, स्वास्थ्य और ऊर्जा को नष्ट कर देती है। संत लहरी सिंह कश्यप का संदेश था कि व्यक्ति को समस्याओं से डरकर चिन्तित नहीं होना चाहिए, बल्कि कर्म करके, विवेक लगाकर उसका समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए वे कहते थे कि निष्क्रिय होकर बैठने और चिन्ता करने से बेहतर है कि थोड़ा-सा भी प्रयास किया जाए। उनका दृष्टिकोण था कि चिन्ता मुख्यतः भूत और भविष्य से जुड़ी होती है। भूतकाल की घटनाओं पर चिन्ता करना निरर्थक है क्योंकि उसे बदला नहीं जा सकता। भविष्य की चिन्ता करना भी व्यर्थ है क्योंकि वह अभी आया ही नहीं। वे हमेशा वर्तमान क्षण में जीने और वर्तमान कर्म पर ध्यान देने की प्रेरणा देते थे। संत जी का मानना था कि चिन्ता करने से मनुष्य का आत्मबल टूटता है इसके विपरीत, यदि मनुष्य धैर्य, विश्वास और परिश्रम से आगे बढ़े तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी सरल हो सकती हैं। वे लोगों को समझाते थे कि चिन्ता केवल व्यक्ति की नहीं बल्कि परिवार और समाज की शांति को भी भंग करती है। इसीलिए वे समूहिक सहयोग और साझा समस्याओं के समाधान पर जोर देते थे। , संत लहरी सिंह कश्यप का दृष्टिकोण था कि चिन्ता त्यागकर आत्मविश्वास, परिश्रम और विवेक को अपनाना ही जीवन में सफलता और शांति का मार्ग है। जीवन में समय-समय पर चिंता का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चिंता के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं। प्रायः नकारात्मक * प्रभावों पर अधिक चर्चा होती है। इस संदर्भ में चिंता को चिता समान कहा जाता है। यह सत्य है कि चिंता का अतिरेक व्यक्ति को आशंका, भय. घबराहट या अनिद्रा से ग्रस्त कर सकता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चिंताग्रस्त व्यक्ति अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असफल हो सकता है।यह मान लेना उचित नहीं कि जीवन में चिंता होना बिल्कुल गलत है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्ति में अपनी परिस्थितियों और उत्तरदायित्यों के अनुरूप सम्यक स्तर की चिंता होनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसी विद्यार्थी की अगले दिन परीक्षा है, तो उसे इसकी चिंता होनी चाहिए। अन्यथा वह परीक्षा की तैयारी में ध्यान नहीं दे पाएगा और उसका परीक्षा-फल प्रभावित हो सकता है। उपयुक्त स्तर की चिंता हमें अपने उद्देश्यों के प्रति प्रेरित करती है और सतर्क रखती है, जिससे हम त्रुटियों से बचते हैं।
इसलिए चिंता के दुष्प्रभावों से सावधान रहने के साथ ही हमें इसकी सकारात्मक भूमिकाओं के महत्व को भी समझना चाहिए। सामान्यतः जो चिंता होती है, उसके स्पष्ट कारण होते हैं और यह अस्थायी होती है। जब कारण समाप्त हो. जाते हैं, तो चिंता भी समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत कभी-कभी व्यक्ति में ऐसी चिंता देखी जाती है, जिसका कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता और जो निरंतर बनी रहती है। ऐसी असामान्य चिंता व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है, जिसके लिए उचित उपचार आवश्यक होता है। इस प्रकार चिंता को एक सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है, क्योंकि यह हमें जिम्मेदार बनाती है और हमारे जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। संत लहरी सिंह प्रवचन करते समय सुनाते रहते थे कि
चिन्ता मत कर भाई!
अरे भाई, चिन्ता से कुछ ना होगा,
चिन्ता तो चिता समान।
मन को खाये, तन को गालै,
बुझा दे जीवन की जान।
बीती बात पे क्यों पछतावे?
गुज़री चीज़ न आवै।
आवन वाले कल की चिन्ता,
काहे को मन डावै?
आज जो हाथ में पल है तेरा,
उसे ही साचा मान।
कर्म करै जा, हिम्मत धरै जा,
फिर मिलेगा सम्मान।
चिन्ता करैगा तो मन टूटैगा,
राह और कठिनाई होय।
विश्वास धर ले, श्रम में जुट जा,
सुख-शांति अपने संग होय।
कहैं संत लहरी सिंह कश्यप—
"चिन्ता छोड़, भरोसा धर।
कर्म करैगा नेक इन्सां,
दुख-दर्द सब छूटि जड़।"
sant lahari singh kashyap amar rahe
जवाब देंहटाएंjay sant lahari singhkashyap
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