लहरीपुर में 12 अक्टूबर को मनाया जाएगा संत लहरी सिंह कश्यप का 13वाँ स्मृति दिवस
जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से मुक्त समतामूलक समाज की स्थापना तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र निर्माण विषय पर होगा वैचारिक विमर्श
लहरीपुर, 10 अक्टूबर 2026।
उत्तर प्रदेश के शामली जनपद में स्थित लहरीपुर गाँव में आगामी 12 अक्टूबर 2026, सोमवार को गाँव के संस्थापक संत लहरी सिंह कश्यप जी का 13वाँ स्मृति दिवस श्रद्धा, सम्मान और सामाजिक चेतना के साथ मनाया जाएगा। कार्यक्रम का आयोजन प्रातः 10 बजे से किया जाएगा। इस अवसर पर संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन-दर्शन, उनके सामाजिक योगदान और मानवतावादी विचारों को स्मरण करते हुए समतामूलक समाज के निर्माण की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
इस वर्ष स्मृति दिवस का प्रमुख विषय है— “संत लहरी सिंह कश्यप जी के मानवतावादी जीवन-दर्शन के आलोक में जाति, धर्म एवं सामाजिक भेदभाव से मुक्त समतामूलक समाज की स्थापना तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र निर्माण।” कार्यक्रम का प्रारंभ संविधान की उद्देशिका की शपथ लेकर किया जाएगा
यह विषय केवल एक स्मृति कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान भारतीय समाज के सामने उपस्थित सामाजिक असमानता, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की चुनौतियों, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से जुड़े प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है। कार्यक्रम के माध्यम से संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन से प्रेरणा लेकर समाज में समानता, बंधुत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत करने का संदेश दिया जाएगा।
कार्यक्रम के संयोजक विनोद कुमार हथियान, डॉ. सतीश कुमार, डॉ. सत्यपाल सिंह तथा प्रोफेसर (डॉ.) जी. सिंह कश्यप हैं।
संत लहरी सिंह कश्यप : लहरीपुर की स्थापना और सामाजिक प्रेरणा
संत लहरी सिंह कश्यप जी का नाम लहरीपुर गाँव की स्थापना और उसकी सामाजिक पहचान के साथ जुड़ा हुआ है। उपलब्ध स्थानीय जानकारी के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1968 में लहरीपुर की स्थापना की थी। किसी गाँव की स्थापना केवल घरों और बस्तियों के निर्माण की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि वह एक समुदाय के विकास, आपसी सहयोग, सामाजिक संबंधों और सामूहिक जीवन की शुरुआत भी होती है।
इसी दृष्टि से संत लहरी सिंह कश्यप जी का स्मरण लहरीपुर के इतिहास, उसकी सामाजिक यात्रा और भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा से जुड़ा हुआ है। उनका स्मृति दिवस गाँव के लोगों को अपने इतिहास और विरासत से जुड़ने का अवसर देता है। यह दिन उन मूल्यों पर विचार करने का अवसर भी है, जिनके आधार पर एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है।
महापुरुषों और समाज सुधारकों का वास्तविक सम्मान तभी सार्थक होता है, जब उनके जीवन से जुड़ी स्मृतियों को सामाजिक जागरूकता, जनकल्याण और सकारात्मक परिवर्तन से जोड़ा जाए। इसी उद्देश्य से संत लहरी सिंह कश्यप जी के स्मृति दिवस को मानवतावादी विचारों और सामाजिक सरोकारों के साथ आयोजित किया जा रहा है।
मानवतावाद : मनुष्य की गरिमा सर्वोपरि
संत लहरी सिंह कश्यप जी के मानवतावादी जीवन-दर्शन के आलोक में इस कार्यक्रम का केंद्रीय विचार यह है कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति, धर्म, जन्म अथवा सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा, आचरण, संवेदनशीलता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से होनी चाहिए।
मानवतावाद का मूल आधार यह स्वीकार करना है कि प्रत्येक मनुष्य सम्मान, स्वतंत्रता, समान अवसर और न्याय का अधिकारी है। किसी भी व्यक्ति के साथ जन्म, जाति, धर्म, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
भारतीय समाज ने अनेक ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण सामाजिक विभाजन और असमानताओं का सामना किया है। इन चुनौतियों का समाधान संवाद, शिक्षा, संवैधानिक चेतना, सामाजिक सहयोग और न्यायपूर्ण व्यवस्था के माध्यम से किया जा सकता है।
स्मृति दिवस के अवसर पर इस बात पर विशेष बल दिया जाएगा कि मानवता को सामाजिक जीवन का आधार बनाया जाए। समाज में ऐसी परिस्थितियाँ विकसित हों, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने, अपनी प्रतिभा का विकास करने और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने का अवसर प्राप्त हो।
जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव से मुक्त समाज की आवश्यकता
भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता उसकी महत्वपूर्ण विशेषता है। विभिन्न भाषाओं, परंपराओं, मान्यताओं और जीवन-पद्धतियों के बीच सह-अस्तित्व भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। लेकिन जब सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को कमतर समझा जाता है या उसके अधिकारों और अवसरों को सीमित किया जाता है, तब सामाजिक एकता और न्याय के सामने चुनौती उत्पन्न होती है।
जाति आधारित भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों की असमानता जैसी समस्याएँ समतामूलक समाज के निर्माण में बाधक हैं। इसी प्रकार धर्म के आधार पर घृणा, अविश्वास और भेदभाव सामाजिक सद्भाव को कमजोर करते हैं।
ऐसे में आवश्यकता है कि समाज में समान नागरिकता, परस्पर सम्मान और मानवीय संबंधों को प्राथमिकता दी जाए। किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था या सामाजिक पृष्ठभूमि उसके प्रति सम्मान और न्याय का निर्धारण करने का आधार नहीं बननी चाहिए।
समतामूलक समाज का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों की व्यक्तिगत मान्यताएँ और जीवन-पद्धतियाँ एक जैसी हों। इसका वास्तविक अर्थ है कि विविधताओं के बावजूद सभी को समान मानवीय गरिमा, अधिकार और अवसर प्राप्त हों।
संत लहरी सिंह कश्यप जी के स्मृति दिवस का विषय इसी व्यापक सामाजिक उद्देश्य की ओर ध्यान आकर्षित करता है। कार्यक्रम के माध्यम से जाति और धर्म से ऊपर उठकर मानवीय संबंधों को मजबूत करने तथा समाज में सहयोग, सद्भाव और समानता की भावना विकसित करने का संदेश दिया जाएगा।
शिक्षा : सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम
शिक्षा किसी भी समाज के विकास की आधारशिला है। यह व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझता है तथा सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और भेदभावपूर्ण व्यवहार के प्रति तार्किक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है।
समानतापूर्ण राष्ट्र निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक बच्चे और युवा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों और वंचित समुदायों के विद्यार्थियों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना सामाजिक विकास की प्राथमिकता होनी चाहिए।
शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं है। उसका उद्देश्य एक जागरूक, संवेदनशील, जिम्मेदार और विवेकशील नागरिक का निर्माण करना भी है। ऐसी शिक्षा आवश्यक है, जो विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवाधिकारों के प्रति सम्मान, लैंगिक समानता, सामाजिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों की समझ विकसित करे।
लहरीपुर में आयोजित होने वाला स्मृति दिवस इस बात पर विचार करने का अवसर है कि गाँव और आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए सामुदायिक स्तर पर क्या प्रयास किए जा सकते हैं। बच्चों की नियमित पढ़ाई, बालिका शिक्षा, पुस्तकालयों की स्थापना, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति जागरूकता और युवाओं के कौशल विकास जैसे विषय सामाजिक पहल का हिस्सा बन सकते हैं।
स्वास्थ्य : सम्मानजनक जीवन का अनिवार्य आधार
स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। स्वास्थ्य का संबंध केवल बीमारी के उपचार से नहीं, बल्कि स्वच्छता, पोषण, सुरक्षित पेयजल, मानसिक स्वास्थ्य, नियमित स्वास्थ्य जाँच और समय पर चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता से भी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए उपचार की उपलब्धता महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। अनेक समस्याओं का समाधान समय पर जाँच, सही जानकारी, स्वच्छ जीवन-शैली और उपलब्ध सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के उचित उपयोग से किया जा सकता है।
समाज के प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाओं तक न्यायसंगत पहुँच मिलनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को गरीबी, सामाजिक पहचान या भौगोलिक स्थिति के कारण आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं से वंचित नहीं रहना चाहिए।
इस संदर्भ में स्मृति दिवस का विषय शिक्षा के साथ स्वास्थ्य को भी सामाजिक न्याय और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार मानता है। सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता, स्वच्छता अभियान, पोषण संबंधी जानकारी और समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।
सामाजिक न्याय : समान अवसर और मानवीय गरिमा
सामाजिक न्याय का अर्थ समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने, अपने अधिकारों का उपयोग करने और विकास के अवसर प्राप्त करने की परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक तथा वर्तमान असमानताओं को समझते हुए ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसके भविष्य की सीमा निर्धारित न करे।
भारतीय संविधान समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के आदर्शों के माध्यम से एक न्यायपूर्ण समाज की दिशा प्रस्तुत करता है। संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता का संकल्प व्यक्त किया गया है।
सामाजिक न्याय को वास्तविक जीवन में लागू करने के लिए कानूनों के प्रति जागरूकता, भेदभाव के विरुद्ध सामाजिक चेतना, शिक्षा के अवसरों का विस्तार और वंचित वर्गों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है।
सामाजिक परिवर्तन केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं होता। परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय, सामाजिक संगठन, स्थानीय समुदाय और नागरिक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब लोग अपने व्यवहार में समानता और न्याय को अपनाते हैं, तब संवैधानिक आदर्श सामाजिक जीवन में अधिक प्रभावी बनते हैं।
संत लहरी सिंह कश्यप जी का स्मृति दिवस इसी संदर्भ में सामाजिक उत्तरदायित्व पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है। समाज में व्याप्त भेदभाव को पहचानना, उसके विरुद्ध शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से आवाज उठाना तथा सभी के लिए समान अवसरों का समर्थन करना सामाजिक चेतना के महत्वपूर्ण पक्ष हैं।
संवैधानिक मूल्य और राष्ट्र निर्माण
भारतीय संविधान देश के लोकतांत्रिक जीवन का आधार है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व इसके मूल आदर्शों में शामिल हैं। ये मूल्य केवल शासन व्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि नागरिकों के पारस्परिक व्यवहार और सामाजिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
संवैधानिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र निर्माण का अर्थ है कि नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाए, कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित हो, विविधताओं को स्वीकार किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की जाए।
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों में भागीदारी से नहीं, बल्कि नागरिक चेतना, विचारों की स्वतंत्रता, तर्कपूर्ण संवाद, असहमति के सम्मान और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही से भी जुड़ी होती है।
संविधान नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है और साथ ही उनके कर्तव्यों की ओर भी ध्यान दिलाता है। नागरिकों का दायित्व है कि वे सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें, सद्भाव बढ़ाएँ और ऐसी गतिविधियों से बचें जो समाज में घृणा तथा विभाजन को बढ़ावा देती हैं।
स्मृति दिवस के अवसर पर संवैधानिक मूल्यों को सामाजिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया जाएगा। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया तभी अधिक समावेशी बन सकती है, जब विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे और प्रत्येक नागरिक स्वयं को देश की प्रगति का समान भागीदार अनुभव करे।
युवाओं और नई पीढ़ी की भूमिका
किसी भी समाज का भविष्य उसकी नई पीढ़ी की सोच, शिक्षा और सामाजिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। युवा यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और संवैधानिक चेतना से प्रेरित हों, तो वे सामाजिक परिवर्तन के प्रभावी वाहक बन सकते हैं।
युवाओं को जाति और धर्म के आधार पर होने वाले भेदभाव से दूर रहकर समानता, सहिष्णुता और सहयोग को अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए। डिजिटल माध्यमों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग, तथ्यपरक जानकारी का प्रसार, अफवाहों से बचाव और सामाजिक समस्याओं के समाधान में भागीदारी भी आज की महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ हैं।
गाँव के इतिहास, सामाजिक योगदान और प्रेरक व्यक्तित्वों का दस्तावेजीकरण नई पीढ़ी को अपनी स्थानीय विरासत से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन, लहरीपुर की स्थापना और गाँव के विकास से संबंधित प्रमाणित जानकारियों का व्यवस्थित संकलन भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।
इस प्रकार स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का भी अवसर है।
स्मृति दिवस को सामाजिक संकल्प से जोड़ने की आवश्यकता
महापुरुषों की स्मृतियाँ तब अधिक सार्थक होती हैं, जब उनसे प्रेरित होकर समाज में सकारात्मक पहल की जाए। संत लहरी सिंह कश्यप जी के 13वें स्मृति दिवस के अवसर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समानता और संवैधानिक जागरूकता से संबंधित विषयों पर गंभीर विमर्श की प्रासंगिकता इसी कारण बढ़ जाती है।
स्थानीय स्तर पर बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता, जरूरतमंद विद्यार्थियों को सहयोग, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का प्रसार, सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध जनचेतना और गाँव के इतिहास का दस्तावेजीकरण जैसे प्रयास समाज को दीर्घकालीन लाभ पहुँचा सकते हैं।
इसके साथ ही यह आवश्यक है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में संवाद, शांति, तर्क और संवैधानिक तरीकों को प्राथमिकता दी जाए। सामाजिक सद्भाव और न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज के पूरक आधार हैं।
संत लहरी सिंह कश्यप जी की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम लहरीपुर की ऐतिहासिक पहचान को व्यापक मानवीय और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का अवसर है।
कार्यक्रम में सहभागिता की अपील
लहरीपुर में 12 अक्टूबर 2026 को प्रातः 10 बजे से आयोजित होने वाले संत लहरी सिंह कश्यप जी के 13वें स्मृति दिवस के अवसर पर समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, शिक्षकों, युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के लोगों से सहभागिता की अपील की गई है।
कार्यक्रम का उद्देश्य संत लहरी सिंह कश्यप जी के जीवन और स्थानीय विरासत का स्मरण करने के साथ-साथ मानवता, समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
यह अवसर सभी को इस प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपने परिवार, गाँव, समाज और राष्ट्र में ऐसा वातावरण बनाने के लिए क्या योगदान दे सकते हैं, जहाँ किसी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो।
संत लहरी सिंह कश्यप जी का 13वाँ स्मृति दिवस इसी संकल्प को आगे बढ़ाने का अवसर है कि मानवता को सर्वोपरि रखते हुए एक न्यायपूर्ण, शिक्षित, स्वस्थ, समतामूलक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण किया जाए।
कार्यक्रम का विवरण
- कार्यक्रम: संत लहरी सिंह कश्यप जी का 13वाँ स्मृति दिवस
- दिनांक: 12 अक्टूबर 2026, सोमवार
- समय: प्रातः 10 बजे से
- स्थान: लहरीपुर गाँव, जनपद शामली, उत्तर प्रदेश
- मुख्य विषय: मानवतावादी जीवन-दर्शन, सामाजिक समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र निर्माण
- संयोजक: विनोद कुमार हथियान, डॉ. सतीश कुमार, डॉ. सत्यपाल सिंह एवं प्रोफेसर (डॉ.) जी. सिंह कश्यप
- कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रदेशों से संत लहरी सिंह कश्यप जी के अनुयाइयों का आगमन होगा
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