शनिवार, 21 दिसंबर 2019

17 अति पिछड़ी जातियों का आरक्षण एक संवैधानिक विश्लेषण : डॉ जी सिंह कश्यप

लहरीपुर गाँव बसाने वाले लहरी सिंह कश्यप जी की छटवीं पुण्यतिथि पर 17 जातियों के आरक्षण पर विशेष चर्चा
        17 जातियां अपने को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग कर रही हैं । इनकी मांग का आधार यह है कि इन जातियों को अन्य प्रातों में अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है परन्तु यूपी में नहीं । ऐसा क्यों हुआ ? यह जानना जरूरी है । अनुसूचित जातियां 1935 के इंडिया ऐक्ट से पहले सामूहिक नाम अछूत से जानी जाती थीं । अछूतों में कई तरह के अछूत थे । कुछ को छूने से छूत लगती थी । कुछ की परछाई से छूत लगती थी । कुछ को देखने मात्र से छूत लगती थी । कुछ को एक निश्चित दूरी पर देखने से छूत लगती थी इत्यादि । इस्ट इंडिया कंपनी में इनमें से कुछ जातियों के नौकरी करने से इनकी कुछ आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई तो ये अपने समाज के हित के लिये काम करना शुरु किये । ब्रिटिश सरकार इनके हित के लिये कुछ करना चाहती थी । पर क्या करे ? कैसे करे ? यह समस्या थी । क्योंकि कुछ करने से देश में विद्रोह का खतरा था । भारत के गवर्नर जनरल के दिमाग में एक बात सूझी । उन्होंने मुस्लिम प्रतिनिधियों को बुलाकर कहा " मैं तुम्हें सेपरेट प्रतिनिधित्व देना चाहता हूं पर तुम्हें इसके लिये पुरजोर मांग करनी होगी । मुस्लिम प्रतिनिधियों ने सर आगा खां के नेत्रृत्व में गवर्नर जनरल से मिलकर अपने लिये सेपरेट प्रतिनिधित्व की मांग की । इन्हीं प्रतिनिधियों ने मिलकर सन् 1906 इंडियन मुस्लिम लीग की स्थापना की । गवर्नर जनरल की तरकीब से ब्रिटिश हुकूमत सहमत न थी । फिर भी गवर्नर जनरल ने मार्ले मिंटो ऐक्ट के तहत सन् 1909 में मुस्लिमों को सेपरेट प्रतिनिधित्व दे दिया । अछुत अपने लिये भी प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे । पर उनको इस ऐक्ट में कुछ नहीं मिला । 1909 के इंडिया ऐक्ट में मात्र 4000 लोगों को मत देने का अधिकार मिला था । गवर्नर जनरल की योजना थी कि यदि हम पहले मुस्लिमों को सेपरेट प्रतिनिधित्व दे देंगे तो ये अछूतों को प्रतिनिधित्व देने के विरोध में हिन्दुओं का साथ नहीं देंगे । तब हमें अछूतों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर हिन्दुओं से निपटने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी । अब गवर्नर जनरल ने इस योजना पर काम करना शुरु किया । उसने सोचा कि पहले यह देखा जाय कि भारत में अछूतों की कुल संख्या कितनी है ? इसलिये उसने 1911 की जनगणना के लिये कुछ मापदंड निर्धारित किये । ये मापदंड 10 थे । जो अछूत जातियां  इन मापदंडों को पूरा कीं उन्हीं को अछूतों की सूची में शामिल किया गया । जो जातियां इन मापदंडों पर खरा नहीं उतरीं उनको इस सूची में शामिल नहीं किया गया । ये 17 जातियां जिन प्रांतों में अछूतों के मापदंड को पूरी कीं उनको तो उन प्रांतों में अछूत की श्रेणी में डाला गया । परन्तु जिन प्रांतों में इन मापदंडों को पूरा नहीं की उन प्रांतों में ये अछूतों की सूची में नहीं डाली गयीं । उ० प्र० में ये जातियां उन मापदंडों को पूरा नहीं कीं इसलिए ये उस सूची में शामिल नहीं हुईं । इन जातियों की यही मांग है कि हमारी जाति जब अन्य प्रांतों में इस सूची में शामिल हैं तो हम क्यों नहीं ? हमें भी इस सूची में शामिल किया जाय । 1911 की इस जनगणना को 1921 के जनगणना ने बिना किसी रद्दो बदल के स्वीकृत कर लिया और 1921 की जनगणना को 1931 की जनगणना ने बिना रद्दो बदल के स्वीकृत कर लिया । 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड ने इन्हीं जातियों के लिये कम्यूनल एवार्ड की घोषणा किया था । ये ही जातियां 1935 के इंडिया ऐक्ट में अनुसूचित जातियों के नाम से जानी गयीं । जब भारत आजाद हुआ तो भारत के संविधान में इन्हीं जातियों को अनु० 330,332,335,341  में रखा गया । अब ये जातियां जब अपने को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग कर रही हैं तो उ० प्र० सरकार इनका वोट लेने के चक्कर में इन जातियों के नेताओं को उकसा रही हैं कि तुम अनुसूचित जाति में शामिल होने की मांग करो । हम तुम्हारी मांग को केंद्र सरकार के पास स्वीकृति के लिये भेज देंगे । केंद्र सरकार को भी तुम्हारा वोट लेने के लिये अनुसूचित जाति में शामिल करना मजबूरी हो जायेगी । परन्तु उ० प्र० सरकार यह भूल जाती है कि केंद्र सरकार 17 जातियों के 13% वोट पाने के लिये क्या पूरे भारत के 24% अनुसूचित जातियों के वोट को नाराज करेगी ? क्योंकि इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने,या न करने का अधिकार संसद को है । उ० प्र० सरकार इन 17 जातियों को अपने प्रांत में चाहे तो विधान मंडल से कानून पारित कर अलग से 13% आरक्षण दे सकती है । जैसे तमिलनाडु और कर्नाटक तथा अन्य कई प्रांतों की सरकारों ने ऐसा किया है । परन्तु उ० प्र० की मुलायम सरकार ,मायावती सरकार ने इनको झांसे में रखा या यों कहें कि इन जातियों ने अपने लिये अलग से 13% आरक्षण की मांग ही नहीं कीं । न दबाव बनाया । जब दबाव बनातीं तो इन सरकारों को झुकने के लिये मजबूर होना पड़ता । यह भी हो सकता है कि ये सरकारें देना चाह रही हों पर पुरजोर मांग और दबाव न होने के कारण नहीं दे रही हैं । अब योगी सरकार इनको झांसे में रखे हुए है और ये पेंडूलम की तरह इधर उधर लटक भटक रहे हैं । अपने लिये इस सरकार से अलग से 13% आरक्षण की मागं नहीं कर रहे हैं न दबाव बना पा रहे हैं । क्योंकि दबाव बनाने से इनके नेताओं का  नुकसान हो सकता है । जो मलाई सरकार से मिल रही है । बंद हो जायेगी । जब कोई विद्वान व्यक्ति इनको समझाने की बात करता है तो ये उसे ही मारने दौड़ पड़ते हैं । सांच कहे तो मारन धावे,झूठे जग पतियाना । 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की लड़ाई इस आशय के साथ  लड़ी जाए कि इन्हें इनकी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी मिलनी चाहिए

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