सोमवार, 6 नवंबर 2023

आरक्षण विषय पर प्रथम न्यायिक निर्णय, प्रथम संविधान संसोधन: डॉ जी सिंह कश्यप


आरक्षण विषय पर प्रथम न्यायिक निर्णय, प्रथम संविधान  संसोधन
 संशोधन   (मद्रास राज्य बनाम चम्मापकम दोराइराजन ए आई आर 1951 ए .सी .पेज- 226)
     भारतीय संविधान के भावनाओं के विरोध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 9-4 -1951 को अपने फैसले में संविधान निर्माताओं की भावनाओं के विरुद्ध निर्णय दिया ।भारत का संविधान 26 -01-1950 को लागू हुआ। तमिलनाडु राज्य की सरकार ने संविधान के अनुच्छेद -46 के तहत सांप्रदायिक सामान्य आदेश नंबर (Communal G.O No-2208 Dated-16-06-1950 )दिनाकित -16-06-1950 के माध्यम से मेडिकल कॉलेज एवं इंजीनियरिंग कॉलेज में आरक्षण की व्यवस्था किया| इस आरक्षण व्यवस्था में प्रत्येक 14 सीट में गैर हिंदू ब्राह्मण 6 सीट, पिछड़ा हिंदू 2 सीट ,ब्राम्हण 2 सीट ,हरिजन 2 सीट ,ईसाई एवं मुसलमान 1-1 सीट की शिक्षा में आरक्षण दिया |जिससे श्रीमती चंपकम दोराइराजन का मेडिकल कॉलेज में तथा सी .आर .श्रीनिवासन को इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश नहीं हो पाया |इसलिए ये दोनों भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मद्रास हाई कोर्ट में मुकदमा करके Communal G.O आदेश की वैधता को चुनौती दिए और याचिका में कहा कि यदि आरक्षण व्यवस्था नहीं की गई होती तो हम लोगों का प्रवेश हो गया होता ।क्योंकि जिन लोगों का प्रवेश हुआ है ,उन लोगों से हम लोगों का नंबर अधिक है ।विद्यालय में प्रवेश न मिलने से हम लोगों के मूलधिकार का हनन हुआ है ।भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 (1)में कहा गया है कि --- "राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म ,मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म ,स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।" तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 29( दो) में कहा है कि--- " राज्य द्वारा पोषित राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म ,मूल वंश ,जाति ,भाषा या इनमें से इसी के आधार पर वंचित नहीं किया जायेगा ।"लेकिन मद्रास राज्य में जाति और धर्म के आधार पर विभेद किया है।इसलिए यह Communal G.O दिनांकित-16-06-1950 अवैध है। मद्रास हाई कोर्ट ने इनके तर्कों से सहमत होते हुए उस आदेश को अवैध घोषित कर दिया जबकि मद्रास सरकार ने शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 46 के तहत किया था ।
संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार --"अनुसूचित जातियों ,अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्ग के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों अभिवृध्दि ---राज्य जनता के दुर्बल वर्गों के विशिष्टता ,अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा और अर्थ संबंधित हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा ।"
         संविधान में ऐसी व्यवस्था इसलिए किया गया है क्योंकि ब्राह्मण धर्म शास्त्रों में एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी .के साथ जाति और धर्म के आधार पर विभेद किया जाता रहा है ।इसी लिए संविधान निर्माताओं ने ऐसी व्यवस्था केवल पिछड़ा वर्ग (एस.सी., एस.टी .,ओ.बी.सी .)के लिए किया ,लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने जातीय पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर संविधान की भावनाओं के विरुद्ध उस शैक्षिक आरक्षण को अवैध कर दिया ।उस समय पेरियार ई. वी .रामास्वामी नायकर जिंदा थे ।उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट के निर्णय के विरूद्ध पूरे मद्रास मे जन आन्दोलन शुरू कर दिया।इधर मद्रास सरकार ने इस निर्णय विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट मेअपील दाखिल कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सात जजों ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को बहाल रखा तथा मद्रास सरकार की अपील खारिज कर दिया और कहा कि य सांप्रदायिक सामान्य आदेश(Communal G.O.) दिनांक 16 -06-1950 संविधान के अनुच्छेद 15 (एक )एवं 29(2) के विरुद्ध है। इसलिए अवैध है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिनांक 3 मार्च 1951 को हो गया जिसको मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपाकम दोराइराजन एवं अन्य केस नंबर- 270 -271/1951 ए आई आर 1951 सुप्रीम कोर्ट पेज नंबर 226 ,229 के नाम से जाना जाता है ।
    उस समय  पेरियार साहब का आंदोलन रंग लाया और नेहरू सरकार परेशान हो गई । नेहरु सरकार यह नहीं चाहती थी कि दक्षिण भारत का आंदोलन उत्तरी भारत में फैले। यदि ऐसा हो गया तो आरक्षण के बिंदु पर पूरे भारत में यह आग फैल जाएगी ।इसलिए नेहरू जी ने विधि मंत्री बाबा साहब डॉ आंबेडकर के पास जाकर इस  अदालती  निर्णय के निदान का अनुरोध किया ।तब बाबा साहब ने कहा कि निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए संविधान संशोधन करना होगा ।तब जाकर प्रथम संविधान संशोधन करके अनुच्छेद 15( 4 )एवं नौवीं अनुसूची की व्यवस्था की गई ।संशोधन बिल की धारा 2 के तहत अनुच्छेद 15 (4), धारा 14 के तहत नौवीं अनुसूची एवं धारा 5 के तहत अन्य जोड़ा गया ।जो इस प्रकार है---
    अनुच्छेद 15 (4 ) ----"इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29(2) की कोई बात राज्य की सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।"
     इस संविधान संशोधन से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दिनांक 03-04-1951 निष्प्रभावी हो गया।
    अनुच्छेद -31( ख) इस प्रकार है-------
      कुछ अधिनियम और विनिमयमो का विधिमान्य करण---
          " अनुच्छेद-31 (क) में अन्तर्विष्ट उपबंधो की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ,नयी अनुसूची में भी विनिर्दिष्ट अधिनियम और विनियमों में से और उनके उपबंधो मे से कोई इस आधार पर शून्य कभी शून्य हुआ नहीं समझा जाएगा कि वह अधिनियम ,विनियम या उपबंध इस भाग के किन्हीं उपंबंधो द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी से असंगत है या उसे छिनता है या न्यून करता है और न्यायालय अधिकरण के किसी
प्रतिकूल निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी  उक्त अधिनियमो और विनियमो में से प्रत्येक, उसे निरसित या संशोधित करने की सक्षम विधानमंडल की शक्ति के अधीन रहते हुए , प्रवृत्त बना रहेगा ।"
डॉ जी सिंह 
राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन 9415973984

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