लहरीपुर गाँव बसाने वाले संत लहरी सिंह कश्यप ने चौसाना जनपद शामली में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा था कि संतोषी व्यक्ति बहुत ही सुखी रहता है मानव जीवन में संतोष सबसे बड़ी संपत्ति है। जिसके पास संतोष का भाव है, वह परिस्थिति चाहे जैसी हो, आत्मिक रूप से सुखी रहता है। संतोष का अर्थ है-अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना, जीवन में जो उपलब्ध है, उसमें प्रसन्न रहना। यह गुण मनुष्य को शांति, धैर्य और सच्चा सुख देता है। यही कारण है कि साधारण जीवन जीने वाले भी अक्सर हृदय से अधिक प्रसन्न दिखते हैं, क्योंकि वे संतोष को अपना आधार मानते हैं। इसके विपरीत विलासिता मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देती। जितनी सुविधाएं मिलती हैं, उतनी ही नई इच्छाएं जन्म लेती हैं। इस दौड़ में इंसान हमेशा कमी महसूस करता है और मानसिक रूप से निर्धन होता जाता है। यह कृत्रिम निर्धनता व्यक्ति को तनाव, ईर्ष्या, असंतोष की ओर ले जाती है। विलासिता जितनी बढ़ती है, आंतरिक शांति उतनी ही घटती जाती है।
अतः जीवन का सच्चा सुख बाहर की चकाचौंध में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष में छिपा है। यदि हम अपने भीतर संतोष का दीप जला लें तो किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रह सकते हैं। वही व्यक्ति वास्तव में समृद्ध है, जो संतोष से भरा है और वही निर्धन है, जो विलासिता के जाल में फंसा है। इसलिए कहा गया है कि संतोष ही सबसे बड़ी संपत्ति है। संतोष का महत्व केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी इसका बड़ा योगदान है। संतोषी व्यक्ति ईमानदारी से कार्य करता है, अपने कर्तव्यों का पालन करता है और दूसरों की संपत्ति या सफलता से ईर्ष्या नहीं करता। वहीं विलासिता के पीछे भागने वाला व्यक्ति प्रायः अनैतिक साधनों का सहारा लेता है और समाज में असमानता एवं भ्रष्टाचार को जन्म देता है। इसलिए यदि हम सच्चे अर्थों में एक स्वस्थ और संतुलित समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो संतोष को अपनाना और विलासिता के मोह से बचना अत्यंत आवश्यक है।कार्यक्रम चौसाना में चौधरी रत्न सिंह के आवास पर दिनाँक 11 सितंबर 2008 को कश्यप निषाद बिन्द समाज सेवा ट्रस्ट के के तत्वाधान में आयोजित किया गया था कार्यक्रम में क्षेत्र के बुद्धिजीवी युवा विद्यार्थी महिलाएं बच्चे तथा समाज के कर्मचारी अधिकारी सम्मिलित हुए थे ।
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