रविवार, 1 फ़रवरी 2026

उद्धार : परमात्मा से नहीं, स्वयं से :संत लहरी सिंह

उद्धार : परमात्मा से नहीं, स्वयं से

संत लहरी सिंह कहते हैं कि “उद्धार” शब्द का प्रयोग उस समय किया जाता है, जब कोई भक्त आपत्काल में आत्मरक्षार्थ परमात्मा को दीन भाव से पुकारता है। इस शब्द में केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि भक्त की लाचारी, विवशता और अंतर की गहन वेदना निहित होती है। सांसारिक दुखों से उत्पन्न यह घनीभूत पीड़ा जब एकनिष्ठ भाव में परिवर्तित हो जाती है, तब वह परमात्मा को जीव के उद्धार के लिए मानो विवश कर देती है। ईश्वर का यह प्रण— “मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता”— इसी भावभूमि से जुड़ा है। द्रौपदी और गजराज इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं।

आध्यात्मिक से लौकिक जीवन तक उद्धार का विस्तार

उद्धार का यह अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ में जितना महत्त्वपूर्ण है, लौकिक जीवन में उससे कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। मानव जीवन त्रिविध तापों से निरंतर प्रभावित रहता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकार ग्राह बनकर मनुष्य को निरंतर अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इनका आकर्षण इतना लुभावना और प्रभावशाली होता है कि बड़े से बड़ा धैर्यवान व्यक्ति भी कई बार विचलित हो जाता है। सामान्य जन तो इनके वशीभूत होकर विविध दुर्व्यसनों में फँस जाते हैं।

अहंकार, अज्ञान और विषाक्त जीवन

जब जीवन अहंकार से भर जाता है, तब न विनम्रता शेष रहती है और न विवेक का जागरण हो पाता है। गुरुजनों का बोध भी मन को अप्रिय लगने लगता है। चारों ओर अज्ञान का आवरण छा जाता है, जिससे केवल व्यक्ति का निजी जीवन ही नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन भी विषाक्त हो उठता है। ऐसे में शांति की खोज बाहर की दुनिया में की जाती है, जबकि वास्तविक समस्या भीतर छिपी होती है।

जब तक इन आंतरिक विकारों से उद्धार नहीं होता, तब तक जीवन में स्थायी शांति संभव नहीं है।

याचना परमात्मा से नहीं, अंतरात्मा से

इस उद्धार के लिए दीन भाव आवश्यक है, पर यह दीनता परमात्मा के समक्ष नहीं, अपनी अंतरात्मा के सामने होनी चाहिए। आत्मिक दृढ़ता के साथ स्वयं से यह स्वीकार करना कि “मैं ही अपनी समस्याओं का कारण हूँ”— यही वास्तविक आरंभ है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि मानव को अपना उद्धार स्वयं करना चाहिए। स्वामी रामतीर्थ का कथन इस विचार को और अधिक दृढ़ करता है—
“यदि संसार में करोड़ों राम, कृष्ण और बुद्ध भी जन्म ले लें, तो भी तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता, जब तक तुम स्वयं इसके लिए खड़े नहीं होते।”

स्वयं से स्वयं का उद्धार

अतः सांसारिक बुराइयों के निवारण हेतु किसी बाहरी चमत्कार की प्रतीक्षा व्यर्थ है। अपने दुर्गुणों से उद्धार, अपने भीतर झाँकने से ही संभव है। यह उद्धार केवल भगवत्-प्रार्थना से नहीं, बल्कि आत्मिक दृढ़ता, आत्मावलोकन और निरंतर आत्मसंघर्ष से प्राप्त होता है।

जब मनुष्य स्वयं से स्वयं का उद्धार करता है, तभी उसका जीवन-पथ प्रशस्त होता है—
और वही सच्चे अर्थों में उद्धार है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें