प्रेम : सृष्टि का मूल तत्व और जीवन का परम सत्य
संत लहरी सिंह कश्यप जी का यह विचार कि “कण-कण में विद्यमान आकर्षण से जगत का अस्तित्व है और वही आकर्षण प्रेम है” — एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि सृष्टि-दर्शन का गूढ़ सूत्र है। यदि हम गहराई से विचार करें तो पाएँगे कि ब्रह्मांड का संपूर्ण तंत्र आकर्षण पर आधारित है। पृथ्वी सूर्य के आकर्षण से बंधी है, समुद्र चंद्रमा के आकर्षण से ज्वार-भाटा बनाता है, परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉन नाभिक के आकर्षण से जुड़े रहते हैं। यही आकर्षण चेतन जगत में भाव बनकर प्रकट होता है — और वही प्रेम है।
अर्थात प्रेम केवल मनुष्य की भावना नहीं, बल्कि सृष्टि का आधारभूत नियम है। यह उतना ही सत्य है जितना परमात्मा। इसलिए कहा गया — “प्रेम हरि को रूप है, हरि हैं प्रेम स्वरूप।” ईश्वर को समझने का मार्ग ज्ञान या तर्क से पहले प्रेम से होकर जाता है। जिस हृदय में प्रेम नहीं, वहाँ ईश्वर की अनुभूति संभव नहीं।
प्रेम का वास्तविक स्वरूप
आज के समय में प्रेम शब्द का अर्थ बहुत संकीर्ण कर दिया गया है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सुख की मानसिकता ने प्रेम को केवल प्रेमी-प्रेमिका के संबंध तक सीमित कर दिया है। फिल्मों और सोशल मीडिया में जिस प्रेम को दिखाया जाता है, वह अधिकतर आकर्षण या वासना का रूप होता है।
परंतु वासना और प्रेम में मूलभूत अंतर है।
- वासना शरीर से उत्पन्न होती है; प्रेम आत्मा से।
- वासना लेने की चाह रखती है; प्रेम देने की।
- वासना क्षणिक है; प्रेम शाश्वत।
- वासना स्वार्थ है; प्रेम समर्पण है।
यदि संबंध केवल आकर्षण पर आधारित हो, तो वह परिस्थितियों के बदलते ही टूट जाता है। किंतु जो संबंध प्रेम पर आधारित होते हैं, वे समय की आँधियों में भी अडिग रहते हैं।
भारतीय संस्कृति में प्रेम की अवधारणा
भारतीय संस्कृति ने प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया है। यहाँ प्रेम केवल दैहिक संबंध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक बंधन है। माता का वात्सल्य, पिता का संरक्षण, गुरु का मार्गदर्शन, मित्र का विश्वास — ये सब प्रेम के ही रूप हैं।
भारतीय विवाह-संस्कार में पति-पत्नी का संबंध सात जन्मों का माना गया है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि यह संबंध आत्मिक है। सात फेरे सात व्रतों का प्रतीक हैं — साथ निभाने, सम्मान देने, कष्ट में सहयोग करने और जीवन भर निष्ठा बनाए रखने का संकल्प।
यदि इन व्रतों में प्रेम का तत्व न हो, तो विवाह केवल सामाजिक अनुबंध बनकर रह जाता है। परंतु जब उसमें प्रेम, त्याग और समर्पण जुड़ जाते हैं, तो वही संबंध जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है।
दुष्यंत और शकुंतला : प्रेम का आदर्श
भारतीय साहित्य में प्रेम की पवित्रता का उत्कृष्ट उदाहरण राजा और की कथा है। उनका प्रेम केवल आकर्षण नहीं था; उसमें उत्तरदायित्व था, स्वीकार था और अंततः सामाजिक प्रतिष्ठा भी थी। उनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम “भारत” पड़ा।
यह कथा बताती है कि सच्चा प्रेम केवल दो व्यक्तियों को नहीं जोड़ता, वह इतिहास गढ़ सकता है, राष्ट्र की पहचान बन सकता है।
प्रेम : संबंधों की आत्मा
प्रेम के बिना कोई संबंध टिक नहीं सकता। यदि टिकता भी है तो वह केवल औपचारिकता है। प्रेम संबंधों को जीवंत रखता है।
- माता-पिता का प्रेम बच्चों को संस्कार देता है।
- पति-पत्नी का प्रेम परिवार को स्थिरता देता है।
- भाई-बहन का प्रेम विश्वास देता है।
- मित्रता का प्रेम साहस देता है।
जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ अहंकार है; जहाँ अहंकार है, वहाँ टकराव है। प्रेम अहंकार को पिघला देता है।
प्रकृति में प्रेम
प्रेम केवल मनुष्य तक सीमित नहीं। प्रकृति भी प्रेम की साक्षी है। सूरजमुखी का फूल सूर्य की ओर मुख करता है — मानो अपने प्रिय का दर्शन कर रहा हो। चकोर चंद्रमा को निहारता है। धरती को हम माँ कहते हैं, आकाश को पिता और चंद्रमा को मामा।
ये संबोधन केवल कल्पना नहीं, बल्कि उस भाव का प्रमाण हैं जहाँ जड़ और चेतन का भेद मिट जाता है। प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती है।
आधुनिक समाज की विडंबना
आज रिश्तों में टूटन बढ़ रही है। कारण है — प्रेम की जगह अपेक्षा और अहंकार का बढ़ना। लोग संबंध तो बना लेते हैं, पर निभाने का धैर्य नहीं रखते।
सच्चा प्रेम समय मांगता है। वह परीक्षा लेता है। वह कठिनाइयों में परखा जाता है। यदि त्याग और धैर्य न हो, तो प्रेम अधूरा रह जाता है।
आज आवश्यकता है कि हम प्रेम की पवित्रता को पुनः समझें। उसे क्षणिक आकर्षण से अलग पहचानें।
प्रेम और अध्यात्म
प्रेम का सर्वोच्च रूप भक्ति है। जब भक्त ईश्वर से प्रेम करता है, तो वह अपने अहंकार को त्याग देता है। प्रेम मनुष्य को व्यापक बनाता है। वह केवल “मैं” और “मेरा” तक सीमित नहीं रहता, बल्कि “हम” और “सबका” तक विस्तृत हो जाता है।
प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्य को मानवता से जोड़ती है। यदि प्रेम है तो हिंसा नहीं होगी, यदि प्रेम है तो द्वेष नहीं होगा।
निष्कर्ष : प्रेम का संकल्प
प्रेम अनादि है, अनंत है। वह देश, काल और परिस्थिति से परे है। प्रेम ही संबंधों की आत्मा है और जीवन की सार्थकता भी।
आज हमें संकल्प लेना होगा कि —
- प्रेम को वासना से अलग पहचानेंगे।
- संबंधों में त्याग और समर्पण को स्थान देंगे।
- परिवार और समाज में प्रेम की नींव मजबूत करेंगे।
तभी जीवन अर्थपूर्ण होगा। प्रेम ही ईश्वर है, प्रेम ही सत्य है, और प्रेम ही मानव जीवन का परम लक्ष्य।
जब हृदय में सच्चा प्रेम जागृत होगा, तभी संसार में शांति और संतुलन स्थापित होगा। प्रेम को समझना ही जीवन को समझना है — और प्रेम को जीना ही परमात्मा को पाना है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें